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आज Feelbywords.Com आपके लिए लेकर आए है | भारत की भूमी पर जन्मे और भारत के स्वातंत्र्य संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान देनेवाले वीर पुत्र नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी का जीवन परिचय |

Information of Subhash Chandra Bose in Hindi

भारत को आजादी दिलाने के लिए अनेक पराक्रमी वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया   है  | कई शहीद भी हुए है | भारतीय जनता भारत में ब्रिटिशों के विरोध में आंदोलन में सहभागी थी | मात्र भारत के बाहर जाकर एक सहस्त्र सेना के साथ भारत पर आक्रमण करके भारत को ब्रिटिशों के चंगुल से मुक्त करने का एक धाडसी प्रयत्न जिस महान पराक्रमी वीर ने किया है उनका नाम है नेताजी सुभाष चंद्र बोस |

information of subhash chandra bose in hindi

Netaji Subhash Chandra Bose

भारत का इतिहास उनके पराक्रम के बगैर पूरा ही नहीं हो सकता |  जब हमें एक दीवार तोड़नी होती है तब हमें दीवार  पर हतोड़ी  से कई घाव करने पड़ते है | इसका मतलब यह नहीं होता की १०० वे वार से ही दीवार टूट गयी है | दीवार तोड़ने के लिए उससे पहले जो ९९ वार किए थे, उन्होंने दीवार को कमजोर करने का कार्य किया था | उसी प्रकार भारत को आजादी दिलाने का श्रेय गांधीजी और नेहरूजी को दिया गया है फिर भी इस आजादी की लड़ाई में भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आझाद, सुभाषचंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले इन सभी पराक्रमी वीरों ने अपना लहू बहाया है | आज हम इन सभी स्वतंत्र सैनिकों में से एक महत्वपूर्ण योगदान देने वाले पराक्रमी वीर के बारे में जानकारी दे रहे है उनका नाम है सुभाषचंद्र बोसजी |

 

१] आइए जानते है सुभाष चंद्र जी के जन्म के बारे में (Information of Subhash Chandra Bose in Hindi)


सुभाषचंद्र बोस जी का जन्म २३ जनवरी १८९७ में ओडिशा के कटक शहर में हुआ |  उनके पिताजी का नाम जानकीनाथ और माता का नाम प्रभावती था | बचपन से ही वे बगावती प्रवृत्ति के  थे | जब वे स्कूल में  थे तभी से उन पर स्वामी रामचंद्र और विवेकानंद जी  की विचारधाराओं का बहुत बड़ा प्रभाव था | उनके पिता जानकीनाथ बोस यह कटक शहर में नामवंत वकील थे | पहले वह सरकारी वकील रह चुके थे | पर बाद में उन्होंने निजी वकालत शुरू की थी | उन्हें ब्रिटिश काल में सम्माननीय “रावबहादुर “ इस पद से सम्मानित किया गया था | पर भारत पर अंग्रेजों ने कब्जा करने के कारण उन्होंने इस पदवी का त्याग किया था, यही से छोटे सुभाष के मन में अंग्रेजों के लिए द्वेष निर्माण होता गया |

उनके पिता बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रह चुके थे | उनकी माता प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था | इनका दत्त घराना कोलकत्ता में अमीर घराना था | प्रभावती  और जानकीनाथ बोस को ८ लड़के और ६ लड़कियां थी |  सुभाषचंद्र जी उनकी ६वी संतान तथा ५ वे पुत्र   थे | अपने सभी भाइयों में सुभाष जी को शरदचंद्र जी अधिक प्रिय थे | शरदबाबू यह प्रभावती जी और जानकीनाथ जी के दूसरे पुत्र थे | सुभाष जी उनको ‘मेजदा’ कहते थे | शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था |

 2] सुभाष चंद्र बोस जी का विद्यार्थी जीवन –

सुभाषचंद्र बोस जी जन्मजात होशियार थे | यूरोपियन स्कूल ऑफ़ कटक से उन्होंने अपनी १० वी  तक की शिक्षा पूर्ण की | इस स्कूल में उनको दूसरा नम्बर मिलने के कारण प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश मिल गया | कॉलेज  में वह प्रदर्शनवादी थे | इस दरम्यान अंग्रेजों ने भारत में स्वास्थ्य सुविधा अत्यंत निकृष्ट दर्जे की बनाई हुई थी | उस वक्त भारत में ‘कॉलरा’ बीमारी की लहार आई हुई थी तब भारतीय लोगों की इस महामारी के कारण जगह-जगह मृत्यु हो रही थी | तब सुभाषचंद्र बोस जी इन कॉलरा पीड़ितों की मदद करने के लिए जाया करते थे |

उम्र के १५ वे साल में सुभाषजी गुरु को ढूंढने हिमालय गए थे | लेकिन उनका यह कार्य असफल रहा | तभी स्वामी विवेकानंद जी का साहित्य पढ़कर सुभाषजी उनके शिष्य बन गए | कॉलेज में शिक्षा लेते वक्त अन्याय विरुद्ध लड़ने की उनकी प्रवृत्ति बन गयी थी | प्रेसिडेंसी कॉलेज में अंग्रेजी प्राध्यापक ‘‘ओटेन’’ यह भारतीय विद्यार्थियों के साथ बुरा व्यवहार करता था, उनको मरता-पिटता था | इसलिए सुभाषजी ने कॉलेज में हड़ताल कर दी | कॉलेज के हेडमास्टर के पास उन्होंने मांग की थी, की प्राध्यापक ‘‘ओटेन’’ ने विद्यार्थियों से माफ़ी मांगनी चाहिए नहीं तो वे हड़ताल करेंगे | प्राध्यापक ‘‘ओटेन’’ ने माफ़ी माँगने से इनकार किया तो सुभाष जी ने आखिरकार हड़ताल करदी | यह खबर वर्तमान पत्र में छपकर आई |

उसके बाद प्राध्यापक ‘ओटेन’ ने माफ़ी मांगी, लेकिन माफ़ी मांगने के बाद भी प्राध्यापक ‘ओटेन’ नहीं सुधरे| उन्होंने फिर से भारतीय विद्यार्थियों पर अत्याचार करना शुरू किया परन्तु इस बार विद्यार्थियों ने बदले में प्राध्यापक ‘ओटेन’ को ही पीटा | इस घटना के बाद सुभाषचंद्र बोसजी को कॉलेज से निष्कासित किया गया |

कॉलेज के प्रिंसिपल ने सुभाष बाबू को एक मौका देने का प्रयत्न किया परन्तु उसमें शर्त थी की, सुभाषजी को कॉलेज के बोर्ड को माफ़ी मांगनी पड़ेगी | इस शर्त के लिए सुभाष बाबू ने इनकार किया और उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया |

3] कैसे बने नेताजी ICS अफसर? आइए जानते है

उसके बाद सुभाषचंद्र बोसजी को उनके पिताजी, जो की बैरिस्टर थे उन्होंने उनको सिविल सर्विस के लिए प्रोत्साहित किया | सुभाष बाबू सिविल सर्विस की तैयारी के लिए ब्रिटेन गए | उस वक्त में सिविल सर्विस की तैयारी के लिए चार साल लगते थे परन्तु सुभाषचंद्र बोसजी ने यह  काम सिर्फ सात महीने में किया और चौथे नम्बर पर आ गए | उसके बाद सिविल सर्विस में काम करने का उनका मन रहा ही नहीं | सिविल सर्विस में काम करने का मतलब अंग्रेजों की गुलामी करना था | उधर मेरे भाई बंधु अंग्रेजों की गुलामी में है और मैं इधर सुख सुविधापूर्ण नौकरी करु ? ऐसा प्रश्न और भावना सुभाषचंद्रजी के मन में आई |

इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी | उन्होंने अपना इस्तीफा मंत्री मोंटेग्यू को दे दिया | भारतीय कार्यालय में उनके पिताजी के मित्र विलयम ड्यूक ने यह इस्तीफा अपने पास रखकर उनके पिताजी को यह सुचना भेज दी, तो उनके पिताजी का यह जवाब आया की, मैं अपने  बेटे के इस कार्य को गौरवस्पद समझता हूँ | विलयम ड्यूक उनके पिताजी के इस जवाब से हैरान हो गए और उन्होंने सुभाषचंद्र जी को पूछा की तुम अपने उदरनिर्वाह की व्यवस्था कैसे करोगे ? तो सुभाषबाबू ने तुरंत इसका जवाब दिया की, मुझे बचपन से दो आने में निर्वाह करने की आदत है और दो आने मैं कैसे भी पा लूंगा | उनके इस उत्तर से विलयम ड्यूक आश्चर्यचकित दृष्टी से सुभाषबाबू की तरफ देखने लगे |

जब यह बात भारत में फैली तब हर-एक भारतीय आश्चर्य में था की इतनी सुख-सुविधापूर्ण नौकरी छोड़ने वाला यह भारतीय है कोण?  जब सुभाषचंद्र बोसजी जहाज से भारत वापिस आए तब उनको देखने के लिए अनेक भारतीयों की भीड़ उमड़ पड़ी थी |

 

4] कैसे की नेताजी ने अपनी पार्टी फोर्वर्ड्ब्लॉककी स्थापना?

भारत वापिस आने के बाद उन्होंने कांग्रेस में गांधीजी के नेतृत्व में काम करना शुरू किया| १९२८ में सिविल सर्विस छोड़कर १९३९ में दूसरे विश्वयुद्ध की शुरूवात तक उन्होंने कांग्रेस में काम किया | सुभाषचंद्रजी का यह विचार था की ब्रिटिशों के शत्रु देशों का समर्थन लेकर भारत को आजादी दिलाई जा सकती है परन्तु इस विचार पर गांधीजी सहमत नहीं थे |

Netaji Subhash Chandra Bose with Gandhiji

Netaji Subhash Chandra Bose with Gandhiji

तब उन्होंने सुभाषचंद्र बोस जी  के सामने इस बात का निर्णय लेने के लिए वोटिंग की शर्त रखी | १९३९ में बोस इलेक्शन में उतर गए | इलेक्शन में बोस के विरोध में गांधीजी ने सीतारमैया को खड़ा किया और हर प्रांतीय कमेटी में जाकर सीतारमैया के लिए प्रचार किया | इलेक्शन में सुभाषचंद्र बोस जी विजयी हुए और १९३९ के कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए परन्तु यह बात गांधीजी को अच्छी नहीं लगी | उन्होंने सुभाष जी को इस्तीफा देने के लिए कहा, सुभाष जी ने गांधीजी की आज्ञा का पालन करते हुए इस्तीफा दे दिया |

 

उसके बाद उन्होंने खुद की पार्टी फारवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की और सम्पूर्ण भारत भर की जनता को अंग्रेजों के विरोध में शस्त्र उठाने के लिए प्रोत्साहित किया | इसी प्रचार के दरम्यान उन्होंने जनता को कहा की, तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा | जनता को ब्रिटिशों के विरोध में भड़काऊ भाषण दिया इसलिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बंदी बना लिया | जेल में रहते सुभाषचंद्र बोसजीने आमरण उपोषण किया जिससे ब्रिटिश सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा पर ब्रिटिशोंने उन्हें अपने ही घर में नजरबंद रखा था |

 

5]  कैसे हुई नेताजी और हिटलर की मुलाकात? आइए जानते है –

उसके बाद सुभाष जी ने अपने ही एक साथी को मदद के लिए बुलाया | उस साथी की गाड़ी में सीट के नीचे छुपकर बोस काबुल के रास्ते से भागकर जर्मनी पहुंच गए | वहां उन्होंने हिटलर से मिलने का बहुत प्रयत्न किया और उसमें वह सफल भी हुए |

सुभाषचंद् जी हिटलर से मिलने के लिए एक कमरे में राह देख रहे थे तभी हिटलर आया और बोला, “हेलो मै हिटलर हूँ” कहकर हाथ मिलाने के लिए हाथ आगे किया | सुभाष जी ने कहा, ”मेरा नाम सुभाषचंद्र बोस है, मै भारत से हिटलर से मिलने आया हूँ’ [ आया हुआ व्यक्ति हिटलर का हमशक्ल था]

Netaji Subhash Chandra Bose Meeting With Hitler

Netaji Subhash Chandra Bose Meeting With Hitler

यह वाक्य सुनकर वह व्यक्ति  आश्चर्य चकित रह गया की इसने कैसे पहचाना की मैं हिटलर नहीं हूँ|

उसके बाद हिटलर का दूसरा हमशक्ल आया, उसने भी सुभाष जी के साथ हाथ मिलाने का प्रयास किया | इस वक्त भी सुभाष जी ने पहचान लिया की यह भी हिटलर नहीं है |

यह बात असली हिटलर तक पहुंच गयी तब वह स्वयं सुभाष जी से मिलने के लिए आ गया और थोड़ी दूरी पर खड़े होकर कहा, “कहो क्या काम है?” तभी बोस समझ गए की यही असली हिटलर है| [ हिटलर ने अपने कुछ हम शक्ल बनाकर रखे थे क्योंकि उसकी जान को खतरा था], हिटलर ने सुभाषचंद्रजी को पूछा की, तुमने कैसे पहचाना की मैं ही वास्तविक हिटलर हूँ | तब बोस ने जवाब दिया की, मैं आपसे मदद मांगने के लिए भारत से आया हूँ फिर भी आपके व्यवहार में अभिमान नहीं था इसी बात पर गौर करते हुए मैंने आपको पहचान लिया की आप ही हिटलर है |

इसके बाद हिटलर ने बोस को बताया की भारत जर्मनी से बहुत दूर है इसलिए हमला करना बहुत मुश्किल होगा, यह कहकर हिटलर ने बोस को अपनी एक पनडुब्बी(Submarine) दी जिसकी सहायता से सुभाष जी जपान गए |

 

6] कैसे मिली नेताजी को आज़ाद हिन्द फ़ौज की कमान? आइए जानते है –

पनडुब्बी की सहाय्यता से बोस जपान गए वहां रासबिहारी बोसजी ने आझाद हिन्द सेना’ की स्थापना की थी जिसकी कमान रासबिहारी बोसजी ने सुभाषचंद्रजी के हाथ में सौंप दी| जब जपान में जो भारतीय थे उनको इस बात का पता चला की, आझाद हिन्द सेना’ सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में कार्य कर रही है तब उन लोगों में ‘आझाद हिन्द सेना से जुड़ने की उत्सुकता बढ़ गयी और महिलाओं ने भी आझाद हिन्द सेना में सहभाग लिया | सुभाषचंद्र बोस ने आझाद हिन्द सेना में महिलाओं की एक विशेष टुकड़ी बनाई और इस टुकड़ी का नाम झाँसी रानी बटालियन’ रखा था |

Netaji Subhash Chandra Bose With Azad Hind Fauj

Netaji Subhash Chandra Bose With Azad Hind Fauj

आझाद हिन्द सेना’ को जपान द्वारा हथियार पहुंचाए जाते थे | धीरे-धीरे आझाद हिन्द सेना ने सिंगापूर,  इंडोनेशिया और म्यानमार का बहुतांश प्रदेश पर अपना कब्जा कर लिया था | जपान ने भारत के अंदमान और निकोबार द्वीप जिनपर ब्रिटिशों ने कब्जा कर लिया था इन द्वीपों को  जीतकर ‘आझाद हिन्द’ सेना को अस्थाई स्वरूप से सौंप दिए| सुभाषचंद्रजी  ने इन दोनों द्वीपों के नाम बदलकर शाहीद’ और स्वराज’ रख दिए थे | उसके साथ ही सिंगापूर पर अधिकार होने के बाद सुभाषचंद्र बोसजी ने वहां भी आझाद हिन्द सरकार की स्थापना की | इस सरकार की अपनी चलन(Currency) व्यवस्था थी |

 

7]  आखिर क्या है नेताजी के मृत्यु के पीछे का रहस्य? आइए जानते है (Death of Subhash Chandra Bose in Hindi) –

१८ अगस्त  १९४५  के बाद का सुभाषचंद्रजी का जीवन और मृत्यु आज तक एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है | १६ अगस्त १९४५ को उन्होंने सिंगापूर से बैंकॉक के लिए प्रस्थान किया था | १७ अगस्त को  सुबह वह बैंकॉक से ‘सैगोन’(Sangoan) गए | १७ अगस्त को तीसरे पहर में वे वहां से तौरानी गए | १८ अगस्त को सुबह ५ बजे वे वहां से जापान अधिकृत फॉरमोसा [ वर्तमान ताईवान]  के लिए रवाना हुए | १८ अगस्त १९४५ को दिन में ढाई बजे उनका विमान दुर्घटना ग्रस्त हो गया और उनका निधन हो गया |

 

नेताजी सुभाषचंद्र बोसजी इस हादसे में सुरक्षित बच गए थे या नहीं, इसके बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है | बंगाल में उनके अधिकतर समर्थक उनकी मृत्यु की बात अस्वीकार करते है, वह इस बात को षड़यंत्र मानते है | उनके निधन के इतने सालों बाद भी आज तक ये पता न चल सका की आखिर उनकी मौत कैसे हुई थी | उनकी मृत्यु पर जो जाँच हुई थी वह भी कुछ सही निष्कर्ष न दे सकी की सुभाषचंद्र बोसजी की मृत्यु एक दुर्घटना है या हत्या?

 

8] क्या था भारत के आज़ादी के पीछे का वास्तविक सत्य? आइए जानते है –

इसके बाद आझाद हिन्द सेना पर किसी का नेतृत्व न होने के कारण यह संघटना लुप्त हो गयी | उसके बाद भारत में जल, थल और वायु इन तीनों सेना में अंग्रेजों के विरोध में बगावत हो रही थी | उस काल में भारत के २.५ लाख सैनिक भारतीय सेना में २५००० हजार ब्रिटिश अधिकारीयों के हाथ के नीचे काम कर रहे थे |  २५००० ब्रिटिश अधिकारीयों को २.५ लाख सैनिकों का विद्रोह संभालना मुश्किल हो गया था इसलिए ब्रिटिशों ने भारत को आजादी दिलाने का निश्चय किया |

Netaji Subhash Chandra Bose with Jawaharlal Nehru

Netaji Subhash Chandra Bose with Jawaharlal Nehru

१९५० -५१ में जब ब्रिटन के तत्कालीन पंतप्रधान ‘क्लिमेंट एटली’ जब भारत के दौरे पर आए तब उनको एक पत्रकार ने पूछा की,  आप इतने शक्तिशाली देश के होने के बाद भी आपने भारत को आजाद क्यों किया?

तब एटली ने जवाब दिया की, आझाद हिन्द सेना ने  लड़े हुए युद्ध से ब्रिटिशों का बहुत नुकसान हुआ था और सुभाषचंद्र बोसजी  के निधन के बाद सेना में जो विद्रोह हुआ उसे ब्रिटिश सरकार को संभालना मुश्किल हो रहा था इसलिए उन्होंने भारत को आज़ाद कर दिया |

पत्रकार ने फिर पूछा की, गाँधी और नेहरू के द्वारा किए गए आंदोलन का इसमें कितना योगदान था? ‘एटली’ ने कहा की, गाँधीजी और नेहरू के आंदोलन करने से ब्रिटन ने भारत को आजादी नहीं दी | इस प्रकार भारत को आजादी दिलाने में नेताजी सुभाषचंद्र बोसजी का प्रथम योगदान था, पर भारतीय इतिहास में इसे दबाने का प्रयत्न किया गया है |

9] कैसे हुआ नेताजी का विवाह? जानते है आगे –

नेताजी ने अपनी सेक्रेटरी ‘एमिली’ से प्रेम विवाह किया था | यह शादी गुप्त तरीके से हुई थी इसलिए ज्यादा प्रचारित नहीं हुई है | इनकी एक बेटी है जिसका नाम ‘अनीता बोस प्फॉफ’ है |

Netaji Subhas Chandra Bose And Wife Emilie Shenkl

Netaji Subhas Chandra Bose And Wife Emilie Shenkl

10]  नेताजी का देश के प्रति योगदान –

सुभाषचंद्र बोसजी  ,जिन्हे नेताजी के नाम से जाना जाता है इन्होंने नारा दिया था, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा | जो आज भी देश के हर नागरिक  और युवाओं के दिलों पर अंकित है उनका यह नारा भारत देश के प्रति कर्तव्य और जिम्मेदारी का अहसास दिलाता है | नेताजी सुभाषचंद्र बोसजी महान देशभक्त, क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे | इनका पूरा जीवन किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं था |

 

नेताजी का मानना था की अहिंसा के बल पर आज़ादी नहीं मिल सकती | नेताजी को मरणोपरांत १९९२ में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था | नेताजी दृढ़ इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति थे | उनके देश के प्रति सच्ची देशभक्ति की भावना ने उन्हें भारत का नायक बना दिया | १९४३ में उन्होंने लगभग ४०००० भारतीयों के साथ आझाद हिन्द सेना’ की स्थापना की थी |

 

नेताजी की महान देशभक्ति और बलिदान के सम्मान में २०२१ से उनके जन्मदिन २३ जनवरी को पराक्रम दिवस‘ की रूप में मनाते है | अपने जीवन काल में नेताजी कुल ११ बार जेल गए थे | नेताजी की महानता का परिचय इसी से मिल जाता है की जब भारत को आज़ादी मिलने के बाद वीर सावरकर द्वारा आयोजित क्रांतिकारियों के सम्मेलन में अध्यक्ष के आसन पर नेताजी का चित्र रखकर आयोजन पूरा किया गया | पूरा भारत देश नेताजी सुभाषचंद्र बोसजी के बलिदान का ऋणी रहेगा | जय हिन्द जय भारत

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