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History-Info of Shivaji Maharaj in Hindi

आप सभी श्रोताओं का Feelbywords.Com पर स्वागत है | आज हम आपको छत्रपति शिवाजी महाराज के सुवर्ण इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी से अवगत कराएँगे परन्तु सर्वप्रथम जानलेते है शिवाजी महाराज के बारे संक्षिप्त परिचय |

छत्रपति शिवाजी महाराज ‘प्रस्तावना'(Chhatrapati Shivaji Maharaj Short Information in Hindi):

छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण नाम ‘शिवाजी राजे भोसले’ था | १९ फरवरी १६३० को मराठा कुर्मी जाती के शाहजी भोसले और जीजाबाई के घर शिवनेरी किले पर एक कुल दीपक का जन्म हुआ | उस बालक का नाम भगवान शिव के नाम पर शिवाजी रखा गया था | जब शिवाजी का जन्म हुआ तब उनके पिता पुणे के पास जुन्नर नगर के नजदीक शिवनेरी किले में एक सहायक के रूप में नियुक्त थे | शिवाजी का बचपन उनकी माता जीजाबाई के मार्गदर्शन में व्यतीत हुआ | जीजाबाई जाधव एक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की असाधारण महिला थी | बचपन में माता जीजाबाई शिवाजी को श्रीराम, वीर हनुमान, कृष्ण, अर्जुन की शौर्य की कथाएँ सुनती थी | धीरे-धीरे शिवाजी ने सभी कलाओं में निपुणता अर्जित कर ली | उनके गुरु दादोजी कोंडदेव थे |

History of Chhatrapati Shivaji Maharaj in Hindi:

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१४ मई १६४० को लाल महल पुणे में साईबाई निम्बालकर से उनका पहला विवाह हुआ | उनकी आठ पत्नियां थी जिनमे साईबाई के अलावा सोयराबाई मोहिते, पुतलीबाई पालकर, लक्ष्मीबाई विचारे, काशीबाई जाधव, सगनाबाई शिंदे, गुणवंतीबाई इंग्ले तथा सकवरबाई गायकवाड़ | शिवाजी के घर चार पुत्रियां और दो पुत्रों ने जन्म लिया | शिवाजी ने युद्ध कला में अनन्य प्रयोग किए | उन्होंने राजनीतिक प्रथाओं और राज-काज में प्रयुक्त शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया | उनका मानना था की भाषा की गुलामी विचारों की गुलामी है | इसीलिए उन्होंने मुघलों द्वारा सर्वत्र थोपी जा रही फ़ारसी भाषा का बहिष्कार किया | उन्होंने फ़ारसी भाषा के स्थान पर मराठी और संस्कृत भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया | उनकी कुशलता और लिए गए निर्णय में चाणक्य की नीतियों की झलक मिलती है | शिवाजी कहते थे की दुष्टों के साथ दुष्टता और शिष्टों के साथ शिष्टता का परिचय ही सफलता का मार्ग है |

 

गुरु दादोजी कोंडदेव तथा जिजामाता के संस्कारों से शिवबा का व्यक्तित्व बना और इसी में से शिवबा के मन में स्वराज्य की ज्योति जल गयी | बचपन में ही शहाजीराजे ने पुणे की जहाँगीरदारी शिवबा को सौंप दी और उन्हें पुणे भेज दिया | १६ साल की उम्र में शिवबाने रायरेश्वर यहां अपने मवाल साथियों के साथ स्वराज्य की शपथ ली | इसके बाद जल्द ही उन्होंने तोरणा किला जीता |

 

शिवाजी के जीवन की दो घटनाएं है जिसमें से उनका पराक्रम और स्वराज्य की ज़िद दिखाई देती है, पहली अफजल खान का वध और दूसरी शाहिस्तेखान का परास्त. १६७४ में उन्होंने रायगढ़ का किला जीता | छत्रपति शिवाजी महाराज के  स्वराज्य में ३०० से भी ज्यादा किलों का समावेश था | उम्र के ५0वे साल में १६८० में शिवाजी का निधन हुआ | उनके निधन के बाद भी स्वराज्य की लड़ाई रुकी नहीं और आगे भी चलती रही |

 

स्वराज्य दिलाने के बाद शिवाजी महाराज की मृत्यु ३ अप्रैल १६८० में हुई | उस समय शिवाजी के

उत्तराधिकार संभाजी को मिले | शिवाजी के जेष्ठ पुत्र संभाजी थे और दूसरी पत्नी से राजाराम नामक दूसरा पुत्र था उस समय राजाराम की उम्र १० साल थी | इसलिए मराठो ने संभाजी को राजा मान लिया | शिवाजी की राजमुद्रा संस्कृत में लिखी हुई एक अष्टकोणीय मुहर थी जिसका प्रयोग वे अपने पत्रों तथा सैन्य सामग्री पर करते थे | माना जाता है की शिवाजी के पिता शहाजी राजे भोसले ने यह राजमुद्रा उन्हें तब प्रदान की थी जब शहाजी ने जीजाबाई और १६ साल के शिवाजी को पुणे की जहाँगीरदारी संभालने के लिए भेजा था | जिस सबसे पुराने पत्र पर यह राजमुद्रा लगी है वह सन १६३९ का है |

कुछ लोगों को सदा के लिए स्मृति में याद रखा जाता है | शिवाजी महाराज एक ऐसा ही व्यक्तित्व है जिन्हें भारतीय इतिहास में गौरवस्पद सम्मानीय और विशेष स्थान दिया गया है | आज उनके निधन को ३५० से भी

ज्यादा साल हो गए है फिर भी आज भी वे अनेकों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है | शिवाजी महाराज पहले राजा थे | जिन्होंने महाराष्ट्र में स्वराज्य की भावना को जगाया | वह एकमेव थे जिन्होंने स्वराज्य का सपना पूरा किया | बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रयता की भावना के विकास के लिए शिवाजी जयंती उत्सव मनाने की शुरु वात की |

 

अब उनकी धार्मिक निती के बारे में जानते है:

शिवाजी एक धर्मपरायण हिन्दू शासक थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे | उनके साम्राज्य में मुस्लिमों को धार्मिक स्वतंत्रता थी | कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया | हिन्दू पंडितों की तरह मुस्लिम मौलवियों और फ़क़ीरों को भी सम्मान प्राप्त था | उनकी सेना में

मुसलमान सैनिक भी थे | शिवाजी हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देते थे

Heroic History-Info of Shivaji Maharaj in Hindi –

छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन के २० सुवर्ण ऐतिहासिक किस्से(20 Historical Facts About Shivaji Maharaj in Hindi)

1] शिवाजी का बालपन(Childhood of Shivaji Maharaj) –

पुणे जिले में जुन्नर शहर के नजदीक बसा हुआ शिवनेरी इस पहाड़ी किले पर १९ फरवरी १६३० में छत्रपति शिवाजी महाराज महाराज का जन्म हुआ | उनका पूरा नाम शिवाजी शहाजी भोसले था | माता का नाम जीजाबाई था | एक कथानुसार बलवान पुत्र होने के लिए जीजाबाई ने शिवाई देवी को प्रार्थना की थी जिसका छोटासा मंदिर शिवनेरी किले पर था | शिवाजी महाराज के जन्म के समय दख्खन की राजसत्ता विजापुर, अहमदनगर, गोवलकोंडा इन तीनों मुस्लिम सल्तनत में विभाजित थी |

 

शहाजीराजे भोसले सर्वप्रथम अहमदनगर के निजामशाह के दरबार में एक सरदार थे | ‘मलिक अम्बर’ निजामशाह का प्रभावी वजीर था, जिसकी मृत्यु के बाद मुघल सम्राट शहाजहान के सैन्य ने इ.स. १६३६ में अहमदनगर पर हमला करके उस शहर पर कब्जा किया | इसके बाद शहाजीराजे विजापुर के आदिलशाह के दरबार में सरदार के पद पर नियुक्त हुए | आदिलशहा ने शहाजी को पुणे की जागीरदारी दी | शहाजी ने तुकाबाई के साथ दूसरा विवाह किया | उसके बाद जीजाबाई बाल शिवाजी को लेकर में निवास करने के आए | तुकाबाई और शहाजी राजे का पुत्र एकोजी भोसले ने तंजावर [तमिलनाडु] में अपना राज्य स्थापित किया |

 

शिवाजी के बचपन से लेकर बड़े होने तक जिजाबाई ने खंबीर बनकर मार्गदर्शन किया, क्योंकि वह भी एक साहसी और निडर महिला थी | शिवाजी की वह आद्य गुरु थी | हिंदवी स्वराज्य का सपना साकार करने के लिए शिवाजी को जीजाबाई ने ही साथ दिया ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है |

युद्धाभ्यास रणनीति और राज्यकारभार संबंधित प्राथमिक मार्गदर्शन शिवाजी को उनके पिता शहाजी की ओर से प्राप्त हुआ | न्याय व्यवस्था और दफ्तर व्यवस्था की शिक्षा उनको दादोजी कोंडदेव, मलठणकर जी के ओर से प्राप्त हुई | विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई देने की शिस्तबद्ध शिक्षा जीजाबाई की तरफ से मिली |

 

2] पहली चढ़ाई – तोरणा किला विजय –

इ.स.१६४७ में उम्र के १७ वे साल में शिवाजी ने तोरणा किला जीता जो आदिल शाह के कब्जे में था और स्वराज्य का झंडा लहरा दिया | इसी साल में शिवाजी ने आदिलशाह के राज्य के सिंह गढ़ [कोंढाणा] और पुरन्दर किले पर विजय प्राप्त किया | और पुणे प्रान्त पर अपना पूर्णता नियंत्रण बना लिया | तोरणा किले के सामने जो मुरुंबदेव का पहाड़ी स्थान है उस पर भी विजय प्राप्त करके उसका नाम राजगढ़ रख दिया | शिवाजी के इस विजय से आदिलशाह चिंतित हो गया, उसे अपने सल्तनत की फ़िक्र होने लगी | आदिलशाह ने एक युक्ति की, शिवाजी की यशस्वी चढ़ाई की लगाम खिच के लिए उसने शहाजी को बंदी बना लिया और फत्तेखां को ५००० की फ़ौज के साथ शिवाजी पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया |

raigad fort

शिवाजी ने पुरन्दर किले पर फत्तेखां कों परास्त किया | शिवाजी ने मुघल बादशाह शाहजहान को दख्खन के सुभेदार के हाथ से संदेश भेजा जिस में उन्होंने अपने पिता शहाजी के साथ शाहजहान के दरबार में नौकरी करने की इच्छा प्रगट की थी | इसका परिणाम यह हुआ की शहाजी राजे को आदिलशाह की कैद से छुड़वाने के लिए शाहजहान ने आदिलशहा पर अपना दबाव डाला और परिणाम ऐसा हुआ के शहाजीराजे आदिलशहा की कैद से छूट गए |

 

3] जावली प्रकरण –

आदिलशहा का वफादार जावली का सरदार चन्द्रराव मोरे, शहाजीराजे और शिवाजी के खिलाफ बाते आदिलशहा को बताता था इसलिए उसे सबक सिखाने के लिए शिवाजी ने रायरी के किले पर अपना कब्जा कर लिया | इ.स. १६५६ में शिवाजी ने यह पराक्रम किया | इस घटना के बाद कोंकणी भाग में स्वराज्य का विस्तार हुआ |

 

4] पश्चिमी घाट पर विजय

भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पर्वत श्रृंखला को पश्चिमी घाट कहते है | दख्खनी पठार के पश्चिमी किनारे के साथ-साथ यह पर्वतीय शृंखला उत्तर से दक्षिण की तरफ १६०० किमी लम्बी है | विश्व में जैविकी विविधता के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है और इस दृष्टि से विश्व में इसका ८ व स्थान है | इ.स. १६५९ तक शिवाजी ने नजदीक के पश्चिमी घाट के और कोंकण के चालीस किले हासिल कर लिए थे |

5] कैसे किया छत्रपति शिवाजी महाराज ने अफ्जल्खान का वध? –

अफ्जल्खान ८ फुट लम्बाई का था. वह रणनीति बनाने में माहिर था, वह दिन था १० नवंबर १६५९. यह घटना महाराष्ट्र के इतिहास में एक रोमांच खड़े करने वाली घटना है | शिवाजी ने अपने बौद्धिक चतुराई से शक्तिशाली अफ्जल्खान का वध कर दिया | शिवाजी ने विजापुर के आदिल शाह के सभी क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य बना लिया था इसलिए आदिल शाह ने अफ्जल्खान को शिवाजी की हत्या करने के लिए अफ्जल्खान को भेजा | अफजलखाँने इसके पहले शिवाजी के बड़े भाई संभाजी कि हत्या की थी |

 

अफ्जल्खान ने आते वक्त रास्ते में पड़े गांव और हिन्दू मंदिरों को उध्वस्त किया | इसी प्रकार से विध्वंस करते हुए वह वहाँ तक पहुंच गया और वहां पर शिवाजी को मिलने के लिए बुलाया | परन्तु शिवाजी महाराज ने वहाँ आने के लिए मना कर दिया और कहना भेजा के मै आपसे डर गया हु अब आप ही प्रताप गढ़ आ जाओ अफ्जल्खान प्रताप गढ़ के निचले भाग में पहुंच गया. वहाँ उनके मिलने की व्यवस्था कि थी | भव्य शामियाना बनाया गया था | प्रतापगढ़ के किले पर शिवाजी महाराज थे किसी भी सेना को वहां तक पहुंचना मुश्किल था | शिवाजी महाराज को अफजलखान के धोखा-धाड़ी वाले स्वभाव की जानकारी थी | मिलने के लिए यह शर्त रखी गई की किसी के भी पास कोई भी हथियार नहीं होगा और दोनों पक्ष के १० अंगरक्षक रहेंगे और उन अंगरक्षकों में से एक शामियाना के बाहर खड़ा रहेगा |

 

शर्त रखने के बाद भी अफजलखान ने अपने कुर्ते के निचे कटियार छुपा के रखी थी. इसका अंदाजा शिवाजी महाराज को आया था, इसलिए उन्होंने भी कुर्ते के निचे चिलखत पहना था, जिरेटोप के निचे ‘शिरस्त्राण’ पहने और मुठ्ठी में न दिखने के बराबर शेर के नाखून(वाघनख) छुपा के रखे थे | शिवाजी न डरते हुए शामियाना में पहुंच गए | शिवाजी को देखते हुए अफजलखान ने कहा, आइए शिवबा हमारे गले लग जाइये कहकर अफजलखान ने शिवाजी को गले लगाने के लिए अपने हाथ पसारे और अपने पास बुलाया. शिवाजी अफजलखान के गले लग गए तभी अफजलखान ने छुपाई हुई कटियार से शिवाजी कि पीठ पर वार किया और उनको अपनी बगल में दबाने की कोशिश की, पर शिवाजी महाराज पहले से ही सावधान थे. अफजलखान के वार से शिवाजी ने अपनी मुठ्ठी में छुपाए हुए

शेर के नाख़ून(वाघनख) अफजलखान के पेट में घुसाकर उसकी आतड़ियाँ बाहर निकाली और उसका वध कर दिया |

 

इसीप्रकार से छत्रपति शिवाजी महाराज महाराज ने अपने बौद्धिक कौशल्य से अफजलखान का वध किया |

अफजलखान ने “धोखा-धोखा” कहकर आक्रोश किया. ये सुनकर बाहर खड़ा सैय्यद नाम का अंगरक्षक

अंदर आया और अफजलखान को मरा हुआ देखकर दांडपट्टे से शिवाजी महाराज के ऊपर वार किया|

तबतक शिवाजी महाराज का वफादार ‘जीवा महाल’ ने पीछे से वार करके सैयद के वार को निष्फल कर दिया और सैयद को मारकर शिवाजी महाराज के प्राणों कि रक्षा की | झाड़ी में छुपे सभी मावलों ने अफजलखान के सैन्य पर आक्रमण करके उनको भगा दिया |

 

महाराष्ट्र के इतिहास में यह युद्ध प्रताप गढ़ की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है | शिवाजी के जीवनकाल में यह महत्वपूर्ण घटना थी |

 

6] कोल्हापुर का युद्ध –

१० नवंबर १६५९ को अफजलखान का वध करने के बाद दिसंबर १६५९ में शिवाजी महाराज

कोल्हापुर के पास ‘पन्हाला’ के नजदीक पहुंचे और उसी वक्त आदिलशाही सरदार रुस्तमजान मिरजे

के पास पहुंच गया | रुस्तमजान के पास अनेक सरदार थे. फाजलखान, मलिक इत्तबार,

सादतखान, याकूबखां, हसनखां, संताजी घाटगे इ. और उसका सैन्यबल भी बहोत बड़ा था |

शिवाजी महाराज की सेना में नेताजी पालकर, हणमंतराव खराटे, हीरोजी इंगले, भीमाजी वाघ इ.

सरदार थे |

 

शिवाजी महाराज ‘पन्हालगढ़’ पर है यह पता लगते ही रुस्तमजमान ‘पन्हाला’ पर आक्रमण

करने की योजना बना रहा था परन्तु २८ दिसंबर को ही सुबह होने से पहले ही शिवाजी महाराज ने

रुस्तमजमान की सेना पर जोरदार आक्रमण किया | पर यह हमला एकसाथ न होकर सेना में छोटे छोटे समूहों में आगे-पिछे से, आजु-बाजू से किया और आदिलशहा की सेना को नमोहरम कर दिया |अंत में रुस्तमजमान मैदान छोड़ कर भाग निकला |

 

7] सिद्धि जौहर का आक्रमण –

अफजल खान की मृत्यु से आगबगूला हुए आदिल शाह ने अपने सेनापति सिद्धि जौहर को सम्पूर्ण शक्ति के साथ शिवाजी पर चढ़ाई करने का आदेश दिया | इ.स. १६६० में हुए इस आक्रमण को शिवाजी के स्वराज्य पर आये हुए अनेक संकटों में से एक समझा जाता है | उस समय शिवाजी, मिरजे के किले को ठिकाना बनाए हुए थे | सिद्धि के आक्रमण का पता लगते ही शिवाजी पन्हालगढ़ पर पहुंच गए, लेकिन इस बात की भनक सिद्धि जौहर को मिल गयी और उसने सम्पूर्ण गढ़ को घेराव बना लिया |

कुछ दिन तक सिद्धि की घेराव बंदी उठने का नाम ही नहीं ले रही थी | तभी एक रात शिवाजी और उनके साथी ‘पन्हालगढ़’ से गुप्त रास्ते से बड़ी फुर्ती से निकल गए | इसका पता लगते ही सिद्धि जौहर ने सिद्धि मसऊद के साथ कुछ सैन्य देकर शिवाजी का पीछा करने के लिए रवाना किया |

 

8] पावनखिंड का युद्ध –

‘पन्हालगढ़’ से कुछ दूरी पर रास्ते में घोडखिंडी तक सिद्धि की सेना पहुंच गई जहां शिवाजी और

उनके साथी पहुंचे थे | उनमें युद्ध शुरू हो गया | तभी शिवाजी महाराज के भरोसेमंद पराक्रमी सरदार

बाजी प्रभु देश पांडे ने शिवाजी को विनती की के वह विशाल गढ़ के लिए आगे निकल जाए और आगे की लड़ाई मैं लढुंगा और ऐसा तय हुआ की शिवाजी विशाल गढ़ पहुंचने के बाद तोपों की तीन बार आवाज करेंगे और इसका मतलब यह होगा की शिवाजी विशाल गढ़ पर सुरक्षित पहुंच गए |

बाजीप्रभु देशपांडे ने वचन दिया की जब तक तीन तोपों की आवाजें नहीं आएगी तब तक सिद्धि जौहर के साथ युद्ध करते हुए उसे रोक के रखूंगा |

 

शिवाजी इस बात के लिए नहीं मान रहे थे पर बाजीप्रभु के विंनतिमय जिद के सामने उन्होंने इस बात को मान्यता दी और विशाल गढ़ के लिए रवाना हुए | बाजीप्रभु ने सिद्धि जौहर के सैन्य को रोक के रख ने के लिए अथक प्रयत्न किया. परन्तु सिद्धि की सेना की संख्या अधिक होने के कारण बाजीप्रभु देशपांडे को अपने प्राणों की बाजी लगानी पड़ी. वह खून से लथपथ हो गए थे | घायल बाजीप्रभु को सैनिकों ने लाकर एक जगह बिठाया. तोपों की तीन आवाजे सुनने के लिए बाजीप्रभु के कान तरस रहे थे | थोड़ी देर में तोपों

की तीन आवाजें सुनाई दी और शिवाजी राजे विशाल गढ़ पर पहुंचने का संदेशा बाजीप्रभु देशपांडे को मिलने के बाद ही उन्होंने अपने प्राण छोड़े |

शिवाजी महाराज को इस बात का बहुत दु:ख हुआ | जिस घोडखिंडी में बाजीप्रभु लड़े और अपने प्राणों

का बलिदान दिया उस घोडखिंडी का नाम बदलकर शिवाजी ने ‘पावनखिंड’ रख दिया |

 

 

9] मुघल शासको के साथ संघर्ष –

भारत में तत्कालीन मुघल साम्राज्य बहुत बलशाली था | उस वक्त दिल्ली में मुघल बादशहा औरंगजेब का शासन था | वह अत्यंत कठोर और क्रूर शासक था |

 

मुघलों से शिवाजी की पहली लड़ाई १६५६-५७ में हुई | औरंगजेब अपने ही पिता शाह जहां को कैद करके स्वयं मुघल सम्राट बना तब तक सारे दक्षिण भाग में शिवाजी अपना आधिपत्य जमा चुके थे | शिवाजी की बढ़ती शक्ति और अफजलखान पर जीत पर औरंगजेब बहुत चिंतित था | वह एक साम्राज्यवादी था और वह अपनी शक्ति को किसी भी चुनौती को बर्दाश्त नहीं कर सकता था | इसके अलावा वह एक सुन्नी पंथी मुसलमान था |

 

दूसरी ओर शिवाजी हिन्दू धर्म की रक्षा करना और अपनी शक्ति बढ़ाकर मराठा साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे | औरंगजेब ने अपने मामा तथा सुबेदार शाइस्तेखान को शिवाजी पर आक्रमण करने का आदेश दिया |  शाइस्तेखान १.५ लाख सैनिकों के साथ पुणे पहुंचा और तीन साल तक प्रचंड लूटपाट की |

 

शाइस्तेखान की सेना ने पुणे पर आक्रमण करके वह अपना वर्चस्व प्रस्थापित किया | इतनाही नहीं,

शाइस्तेखानने शिवाजी के लाल महल पर अपना कब्जा किया | शिवाजी महाराज को यह बात पता चली तब वह अपने ४०० सैनिकों के साथ पुणे गए | एक शादी की बारात में बाराती बनकर शामिल हो गए | जब शाइस्तेखान की सेना लाल महल में आराम कर रही थी तब शिवाजी और उनकी सेना ने शाइस्तेखान और उसकी सेना पर आक्रमण किया, शिवाजी को लाल महल के सभी गुप्त रास्ते पता थे|

 

इसी रास्तों से शिवाजी और उनकी सेना ने अंदर प्रवेश किया था | शाइस्तेखान अचानक शिवाजी को सामने देखकर घबरा गया और भागने लगा | इस भाग-दौड़ में वह खिड़की से कूदकर भाग रहा था  तभी शिवाजी ने तलवार से शाइस्तेखान की उँगलियों पर वार किया और शाइस्तेखान की ३ उंगलिया कट गयी |

 

इस लड़ाई में शिवाजी ने शाइस्तेखान की सिर्फ उंगलिया ही नहीं काटी तो उसके सैकड़ों सैनिकों को मार दिया | इसी प्रकार से शिवाजी ने इस युद्ध पर विजय प्राप्त किया |

 

10] सूरत की प्रथम लूट

इ.स. १६६४. एक के बाद, एक के बाद एक हो रहे युद्धों से शिवाजी के राज्य का खज़ाना खली होता गया | इस बात से शिवाजीराजे चिंतित थे | मुघल तथा बाकी सुलतानों को यह चिंता नहीं सता रही थी क्योंकि

 

वह जनता पर अन्याय करके जबरदस्ती से कर(Tax) वसूल किया करते थे | इसपर शिवाजी ने एक उपाय ढूंढ निकाला और वह था सूरत की पहली लूट.  आज के गुजरात राज्य का सूरत शहर उस वक्त के तत्कालीन मुघल राज्य में आता था | उस वक्त सूरत शहर की गणना व्यावसायिक कारणों से अमीर शहरों में होती थी |

 

शिवाजी ने अपने साथियों के साथ सूरत शहर में लूट की | इससे दो बाते साध्य हुई, पहली मुघल सत्ता को आवाहन, और दूसरी शिवाजी महाराज के खज़ाना में बढ़ोतरी हुई | इस लूट का इतिहास भारत में अत्यंत रक्तरंजित और विनाशक है |

शिवाजी महाराज की आज्ञानुसार महिला,  बूढ़े और बच्चों को नुकसान पहुँचाये बिना ये लूट की गयी | मस्जिद, चर्च जैसे धार्मिक स्थानों को कोई नुकसान न होने दिया |

 

11] मिर्झाराजे जयसिंह प्रकरण –

इ.स. १६६५.  में औरंगजेब ने उनका पराक्रमी सेनापति मिर्झाराजे जयसिंह को प्रचंड  सेना के साथ

शिवाजी पर आक्रमण करने के लिए भेजा | इसमें शिवाजी का परास्त हुआ और शिवाजी को  मजबूरन पुरंदर का समझौता करना पड़ा और इस समझौता के शर्त अनुसार शिवाजी को २३ किले देने पड़े थे | इसके साथ ही आगरा में जो उस वक्त की तत्कालीन राजधानी थी वह स्वयं अपने पुत्र संभाजी के साथ औरंगजेब के सामने पेश होने का आश्वासन देना पड़ा था |

 

 

12] पुरंदर का समझौता –

पुरंदर का किला शिवाजी का पुत्र संभाजी का जन्म स्थान है | यह भारत के महाराष्ट्र राज्य में

स्थित पुणे जिल्हे में सासवड गांव के नजदीक का एक किला है | इसकी ऊंचाई १५०० मी. है |

इस किले में संभाजी का जन्म हुआ इसलिए इस किले का ऐतिहासिक महत्व सर्वाधिक है |

 

पुरंदर किले का विस्तार बहुत बड़ा है | किला मजबूत होकर बचाव के लिए उत्तम जगह है |

किले पर से आजु-बाजु के प्रदेशों पर नजर रखी जा सकती है |

 

13] आगरा से  पलायन ­-

इ.स. १६६६. में औरंगजेब ने शिवाजी को उनके पुत्र संभाजी के साथ मिलने के लिए दिल्ली बुलाया और औरंगजेब को शिवाजी से विजापुर पर किए हुए आक्रमण पर चर्चा भी करनी थी | तदनुसार शिवाजी राजे दिल्ली पहुंच गए | उनके साथ उनका ९ साल का पुत्र भी था | परन्तु शिवाजी को औरंगजेब ने दरबार में उन कनिष्ठ सरदारों के साथ खड़ा किया जिनको शिवाजी ने लड़ाई में हराया था | ऐसे सरदारों के साथ खड़ा करके औरंगजेब ने पराक्रमी शिवाजी का अपमान किया था | इस अपमान से नाराज होकर शिवाजी दरबार से बाहर निकल पड़े लेकिन उसी क्षण उनको बंदी बनाकर नजरकैद रखा गया, और जल्द ही उनकी रवानगी जयसिंह का पुत्र मिर्झाराजे रामसिंग के पास आगरा यहां की गयी |

 

शिवाजी पर उन्हें जरा भी भरोसा नहीं था और डर भी था की कही शिवाजी भाग न जाए | इसलिए उनपर कड़क पहरा देकर नजरकैद में रखा गया था | ऐसे ही कुछ दिन निकल गए, बहुत बार वहां से भागने के शिवाजी ने प्रयास किए लेकिन वह व्यर्थ गए | आखिर शिवाजी ने एक योजना बनाई, उस योजना अनुसार उन्होंने बीमार होने का अभिनय किया | उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए विविध मंदिरों और दरगाहों में मिठाई की पेटियाँ भेजी जाने लगी | शुरु वात में पहरेदार पेटियाँ अच्छी तरह जाँचकर लेते थे पर बाद में इस काम में ढिलाई आने लगी | इसके बाद तो उन्होंने पेटियाँ जांचनी ही छोड़ दी |

 

इस बात  का लाभ शिवाजी ने उठाया, और एक दिन शिवाजी अपने पुत्र संभाजी के साथ एक-एक पेटी में बैठ कर वहां से भागने में सफल हुए | किसी को संशय न आना चहिए इसलिए शिवाजी का भरोसेमंद हीरोजो फरजद यह शिवाजी के कपड़े और अंगूठी पहनकर इस तरह से हाथ बाहर निकालकर सो रहा था की देखने वाले को वह शिवाजी लगे | शिवाजी दूर तक निकल जाने का विश्वास होने के बाद वह भी पहरेदार को चकमा देकर वहाँ से निकल गया | बहुत देर के बाद अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी और न ही कोई हलचल हो रही थी इसलिए पहरेदार अंदर गए तो वहाँ कोई नहीं था तभी सब परिस्थिति उनके समझ में आ गयी | लेकिन उस वक्त तक बहुत देर हो चुकी थी, शिवाजी को निकलकर २४ घंटे हो चुके थे |

 

14] सर्वत्र विजयी घोड़दौड़ –

आग्रा से वापस आने के बाद औरंगजेब ने किए हुए अपमान का बदला लेने के लिए पुरंदर के समझौते में दिए हुए २३ किलों पर अपना कब्जा कर लिया | उन्होंने सबसे पहले कोंढाणा किले पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया | कोंढाणा की लड़ाई में सुभेदार तानाजी मालुसरे वीरगति को प्राप्त हुए | ऐसे करते हुए उन्होंने सभी २३ किलों पर अपनी विजय प्राप्त कर ली |

kondhana fort

15] कैसे बने शिवाजी भोसले, छत्रपति शिवाजी महाराज? –

इतना बड़े साम्राज्य का विस्तार करने के बाद भी शिवाजी सैद्धांतिक दृष्टि से अभी तक राजा नहीं

बने थे | मुघल सम्राट के मतानुसार वह एक जमींदार ही थे | आदिलशाह के लिए तो शिवाजी एक

जहागिरदार के बंडखोर पुत्र थे | किसी भी राजा के साथ समान दर्जा का दावा वो कर ही नहीं सकते

थे | और जिन लोगों पर शिवाजी राज कर रहे थे उन लोगों से राज्यभिषेक के सीवा स्वामिनिष्ठे की

सचमुच की अपेक्षा करना गलत होगा |

 

राज्यभिषेक के बिना जनता शिवाजी की आज्ञा व आदेशों का पालन पूरी निष्ठा से करेगी ऐसा नहीं था | शिवाजी ने बड़े-बड़े प्रदेशों पर अपना स्वामित्व निर्माण किया था और अपार धन-दौलत हासिल कर ली थी | उनके पास मजबूत शिस्तबद्ध लष्कर व संघटित प्रशासकीय यंत्रणा थी, नौ-दल था और असंख्य सैनिकों पर उनका हुक्म चलता था |

 

राज्यभिषेक न होने के कारण शिवाजी किसी भी समझौते पर अपनी स्वाक्षरी नहीं कर सकते थे |

विधिवत मार्ग से किसी को जमीन देना या अपने राजकीय सत्ता के भविष्य का आश्वासन देना मुमकिन नहीं था | उन्हें अपने स्वराज्य को कायदे अनुसार मान्यता दिलाने के लिए, उसका अस्तित्व कायम रहने के लिए राज्यभिषेक आवश्यक था | ऐतिहासिक कागज़ों से यह स्पष्ट होता है की, उस वक्त भोसले घराणे से सबंधित अनेक मराठा सरदारों में द्वेष की भावना निर्माण हुई थी | ऐसे लोग खुद को शिवाजी का सेवक मानने से इनकार कर रहे थे | और खुद को आदिलशहा का एकनिष्ठ सेवक समझ रहे थे |

 

उनका मानना था की शिवाजी भोसले स्वामी-द्रोही और बगावती थे | तो उनका नजरिया बदलने के लिए राज्यभिषेक आवश्यक था | ऐसे सरदारोंको औपचारिक राज्यभिषेक से शिवाजी भोसले अब

छत्रपति शिवाजी महाराज है और वह विजापुर और गोवलकोंडा के शाहं के समान राजा है ऐसा संदेश

दिया जा सकता था |

 

प्राचीन हिन्दू शास्त्र के अनुसार, केवल क्षत्रिय वर्ण के व्यक्ति को ही राजा बनने का अधिकार था | शिवजी महाराज का भोसले कुल क्षत्रिय वर्ण में नहीं आता था, वे ब्राह्मण भी नहीं थे | अर्थात इस शास्त्र के अनुसार भोसले कुल शूद्र थे और ऐसे कुल की व्यक्ति को राजा होने का अधिकार नहीं था |

शिवाजी का राज्याभिषेक उनको कायदे अनुसार ‘क्षत्रिय’ जाहिर करके किया जाए तो ही भारत के सभी भागों के ब्राह्मण राज्याभिषेक में उपस्थित होकर शिवाजी की आशीर्वाद देंगे ऐसी परिस्थिति उस वक्त निर्माण हुई थी |

 

उस वक्त स्वराज्य को ऐसे पंडित की आवश्यकता थी जो शिवाजी को शूद्र कहकर उनके राज्याभिषेक में बाधा डालने वालों का मुंह बंद कर सके और ऐसा पंडित मिल ही गया, उसका नाम विश्वेशर पंडित था | इस पंडित का उर्फ़ नाम गागाभट्ट’ था और वह तत्कालीन ब्रम्हदेव व व्यास कहकर काशी क्षेत्र में प्रसिद्ध था | शुरु वात में कुछ नखरे दिखाने के बाद पंडित गागाभट्ट शिवाजी को क्षत्रिय मानने के लिए तैयार हो गए | उदयपुर के क्षत्रिय घराने से भोसले कुल का संबंध था, यह सिद्ध करने में बालाजी आवजी और कुछ अन्य साथीदारों ने मदद की |

 

उन्होंने भोसले कुल की वंशावली की जाँच करके भोसले कुल को प्रभु श्रीरामचन्द्र के सूर्य वंश का शुद्ध क्षत्रिय घराना है यह सिद्ध कर दिया | इस ठोस सबूत के बाद गागाभट्ट ने महाराष्ट्र में आकर प्रथम पंडित बनकर शिवाजी के राज्याभिषेक की जिम्मेदारी ली और उसके लिए बड़ी दक्षिणा भी ली | शिवाजी और उनके साथीदारों ने सातारा से अनेक किलोमीटर पैदल चलकर गागाभट्ट का अच्छी तरह से स्वागत किया |

 

६जुन इ.स.१६७४ में रायगढ़ पर शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ और इसी दिन से शिवाजी महाराज ने शिवराज्यभिषेक दिन शुरू किया | उन्होंने शिवराई चलन शुरू किया|  इसके साथ नई कालगणना शुरू करके नया साल शुरू हुआ |

 

फ़ारसी-संस्कृत शब्दकोश बनाया गया और इसमें फ़ारसी की जगह संस्कृत शब्द का उपयोग करने के लिए हुक्म जारी किया | पंचांगशुद्धि करने के लिए हुक्म जारी किया, इसके लिए ‘कृष्ण दैवज्ञ’ नामक ज्योतिषी लाया गया |

 

इस ज्योतिषी ने ग्रंथ-लेखन करने के लिए और सबंधितों को रीती नियम का ज्ञान देने के लिए आदेश दिया और उससे करणकौस्तुभ’ नामक ग्रंथ लिखवाया |

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दूसरा राज्यभिषेक

गागाभट्ट के आशीर्वाद से शिवाजी का राज्यभिषेक हुआ | उसके बाद उन्होंने दूसरा राज्यभिषेक

पुराणोक्त अथवा तांत्रिक पद्धति से अश्विन शुद्ध पंचमी २४ सितम्बर १६७४ को हुआ इस बात का उल्लेख शिवराज्यभिषेक कल्पतरु नामक समकालीन संस्कृत ग्रंथ में किया हुआ है | यह ग्रंथ अनिरुद्ध सरस्वती नामक कवि ने लिखा हुआ है | उन्होंने इस ग्रंथ में निस्चलपुरी गोसावी और गोविन्द इन दोनों व्यक्तिओं के बीच का संवाद काव्यरुप में वर्णित किया हुआ है |

 

इस संवाद में यह कहा गया है की, “गागाभट्ट” ने शिवाजी का जो अभिषेक किया उसमें बहुत गलतियां थी और उसका उलटा परिणाम शिवाजी महाराज को भोगना पड़ रहा है | शिवाजी को एक के बाद एक दुखद घटनाओं से गुजरना पड़ रहा है | शिवाजी केराज्याभिषेक के बाद ही सेनापति प्रताप राव गुजर की मृत्यु हो गयी | प्रतापगढ़ पर बिजली गिर गयी | शिवाजी महाराज की पत्नी काशीबाई की मृत्यु हो गयी और राज्याभिषेक के केवल बारा दिन के बाद ही शिवाजी की माता राजमाता जीजाबाई की मृत्यु हो गयी | इन दुखद घटनाओं का उल्लेख किया हुआ है |

 

इन सभी बातों से ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है की, वैदिक पद्धति के राज्याभिषेक में

उस वक्त के तत्कालीन पंडितों में वाद-विवाद थे | कारण कुछ भी था, लेकिन २४ सितम्बर

१६७४ को शिवाजी महाराज का दुसरा राज्याभिषेक तांत्रिक पद्धति से किया गया | यह समारंभ

बहुत ही सादगी पूर्ण तरीके से सम्पन्न हुआ |

 

16] शिवाजी का दक्षिण दिग्विजय –

शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के बाद कर्नाटक प्रान्त पर आक्रमण करने का निश्चय

किया | उन्हें आदिलशहा का विशेष डर नहीं था परन्तु दिल्ली का मुघल बादशहा औरंगजेब मात्र

मराठा राज्य नष्ट करने की फ़िराक में था | मुघल सैन्य का संकट कभी स्वराज्य पर आया तो

दक्षिण में भी सैनिकों के लिए मजबूत जगह होना ऐसा विचार शिवाजी के मन में आया | इसलिए उन्होंने दक्षिण प्रान्त में मुहिम चलाने की योजना बनाई | इस योजना के लिए शिवाजी ने गोवलकोंडा के क़ुतुबशाह से मदद मांगी |

 

क़ुतुब शहा ने मद्त करने की बात ख़ुशी-ख़ुशी कबूल की | दक्षिण मुहिम के पीछे शिवाजी महाराज का और एक उद्देश्य था, उनका सौतेला भाई एकोजी भोसले दक्षिण की तंजावर की जमींदारी संभाल रहा था | शिवाजी को उससे भी कुछ मदद इस काम के लिए लेनी थी | इसलिए शिवाजी इससे मिलना चाहते थे | शिवाजी की दक्षिण मुहिम के दरम्यान गोवलकोंडा के ‘अबुलहसन क़ुतुबशहा’ ने शिवाजी को मिलने का आमंत्रण दिया | शिवाजी ने प्रथम क़ुतुब शाह की राजधानी गोवलकोंडा को भेट दी | गोवलकोंडा में क़ुतुबशहा और उसके प्रजा जनो ने मिलकर शिवाजी का जंगी स्वागत किया |

दरबार में भी क़ुतुब शहा ने शिवाजी महाराज को खास तैयार किए गए सिंहासन पर अपने बराबरी में बिठाया | स्वागत सत्कार स्वीकारने के बाद शिवाजी कर्नाटक की मुहिम पर निकले | चेन्नई के दक्षिण दिशा में जिंजी का किला है | रायगढ़ की तरह प्रचंड और मजबूत है | इस किले का घेराव करके शिवाजी ने इस किले पर विजय पा लिया | उसके साथ ही दक्षिण में मराठा स्वराज्य का एक मजबूत ठिकाना बन गया | उसके बाद शिवाजी ने वेल्लोर के किले का घेराव किया परन्तु कई महीनों तक किला शिवाजी के कब्जे में नहीं आया | तब शिवाजी ने वेल्लोर के नजदीकी पहाड़ी से उस किले पर कई तोपे दाग दी और किला अपने कब्जे में कर लिया |

 

उन्होंने कर्नाटक में कुल २० लाख उत्पन्न का प्रदेश और बहुत सारे छोटे-मोटे किले हासिल किए |

इसके बाद शिवाजी ने अपने सौतेले भाई एकोजी भोसले को मिलने के लिए बुलाया परन्तु एकोजी शिवाजी से मिलने के लिए जरा भी उत्सुक नहीं था | कुछ दिन वह महाराज के साथ रहा परन्तु

एक रात वह शिवाजी को बिना बताए तंजावर के लिए निकल गया और उलटा उसने महाराज की

सेना पर हमला बोल दिया | इस लड़ाई में एकोजी की हार हुई | अपने भाई के इस बर्ताव से

महाराज दुःखी हुए और उन्होंने कई चिठ्ठीया भेजकर चिठ्ठी में एकोजी को समझाने का प्रयत्न किया | जिंजी के दक्षिण भाग का कुछ प्रदेश उसको दिया | एकोजी की पत्नी दीपाबाई समज़दार महिला थी

 

उसने एकोजी को समझाने का प्रयत्न किया | महाराज ने दीपाबाई को भी कर्नाटक का थोड़ा सा प्रदेश दिया | कर्नाटक पर विजय प्राप्त करके शिवाजी महाराज रायगढ़ वापस आ गए |

 

17] छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्यकारभार –

शिवाजी महाराज ने राज्यकारभार के लिए आठ मंत्रियों से बना अष्ट प्रधान मंडल का संघटन किया | यह मंत्री शिवाजी महाराज को राज्यकारभार विषयक कामों में सलाह देते थे | उन्होंने मराठी और संस्कृत भाषा का प्रोत्साहन और विकास किया |

 

शिवाजी महाराज के काल में राज्यकारभार के व्यवहार में फ़ारसी भाषा का प्रयोग बहुत ज्यादा प्रमाण में किया जा रहा था परन्तु शिवाजी महाराज ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किया | शिवाजी ने अपने अधिकारियों की एक समिति बनाई | इस समिति को फ़ारसी और अरेबिक शब्दों की जगह उसी के समान अर्थ के संस्कृत शब्द सुझाने की जिम्मेदारी दी गयी थी | इस समिति ने इ.स. १६७७ में  राज्यव्यवहारकोष ‘ नामक शब्दकोश सादर किया |

 

18] शिवजी महाराज की धार्मिक नीति –

शिवाजी महाराज ने धर्मनिश्पक्ष और सहिष्णु वृत्ति से राज्यकारभार चलाया | विविध धर्म के समन्वय पर उनका विश्वास था | जब औरंगजेब ने जिझिया कर लागु किया तब शिवाजी ने चिठ्ठी भेजकर जिझिया कर रद्द करने की मांग की और औरंगजेब को ये सलाह दी की वह भी अकबर की तरह हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धा रखे | शिवाजी की सेना में शुरु वात से ही मुस्लिम लोगों का समावेश था | १६५६ में पठानों की पहली टुकड़ी बनाई गयी | दर्या सारंग शिवाजी के नौ-दल का प्रमुख एक मुस्लिम था |

 

19] राजमुद्रा –

शिवाजी की राजमुद्रा संस्कृत में थी | शिवाजी जब पुणे का राज्यकारभार देख रहे थे तब उन्होंने

खुद की स्वतंत्र  राजमुद्रा तैयार की | शहाजीराजे और जीजाबाई इनकी मुद्रा फ़ारसी भाषा में थी परन्तु

शिवाजी महाराज ने राजमुद्रा के लिए संस्कृत भाषा का उपयोग किया | इस राजमुद्रा पर यह वाक्य

अंकित किया हुआ था,  “प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुविश्ववन्दिता शाहसुनो: शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते

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इसका अर्थ यह होता है की जिस तरह प्रतिपदा का चंद्र बढ़ता जाता है और सम्पूर्ण विश्व में वंदनीय होता है, उसी तरह शिवाजी की यह मुद्रा और उसका लौकिक बढ़ता ही जायेगा |

 

२०] आखिर क्यों छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती साल में दो बार मनाई जाती है? –

शिवाजी का जन्म इ.स. १६२७ में हुआ ऐसी मान्यता है, तब जयंति “की तिथि वैशाख शुद्ध तृतीया को आती थी | जब जन्म साल इ.स. १६३० निश्चित हुआ तब तिथि फाल्गुन वाद्य तृतीया आ रही थी |

 

शिवाजी के जन्म के समय अगर ग्रेगोरिय दिनदर्शिका प्रचलित होती तो १६३० साल की फाल्गुन वदय तृतीया १९ फरवरी को आ जाती | इसलिए साल २००१ से १९ फरवरी इस तारीख को सरकारी शिव जयंती मनाई जाती है |

 

शिवाजी जयंती को महाराष्ट्र में ‘शिवजयंती’ कहते है | शिवाजी के जन्म दिनांक के बारे में

विवाद होने के कारण शिवजयंती महाराष्ट्र में साल में दो बार मनाई जाती है | उस दिन ढोल-ताशे बजाकर शोभायात्रा निकाली जाती है और शिवाजी की मूर्ति को फूलों की माला पहनाते है |

 

भारत में अंग्रेज आने से पूर्व तिथिनुसार व्यवहार किया जाता था | अंग्रेज आने के बाद

अंग्रेजों का राज्य आने के बाद ग्रेगरीय दिनदर्शिका नुसार व्यवहार हो रहा था | ग्रेगरीय दिनदर्शिका भारत में लागू होने के बाद जिनका जन्म हुआ उनकी जयंती तारीख से मनाते है |

 

जैसे, महात्मा फुले, महात्मा गाँधी, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, लोकमान्य तिलक इन सभी महापुरुषों का जन्म भारत में ग्रेगरीय दिनदर्शिका लागु होने के बाद हुआ था इसलिए उनकी जयंती तारीख पर की जाती है |

 

शिवाजी, गौतम बुद्ध, बसवेश्वर, तुकाराम इन सभी का जन्म भारत में ग्रेगोरिय दिनदर्शिका

लागू करने से पूर्व हुआ है | इनके काल में सारे व्यवहार तिथि से किए जाते थे | इनकी जयंती तिथि से मनाई जाती है |

 

अंग्रेजों ने ग्रेगोरियन कैलेंडर१७५२ साल में स्वीकार किया, उस वक्त तक उनके साम्राज्य में ज्यूलियन दिनदर्शिका अधिकृत थी | ज्यूलियन दिनदर्शिका की कालगणना और ग्रेगोरिय दिनदर्शिका की कालगणना इसमें इ.स. १७०० तक १० दिन का अंतर आता है और १७०० साल से आगे ११ दिन का अंतर् आता है |

अनेक स्थानों में शिवाजी के जन्म के समय जो कालगणना प्रचलित थी उसके अनुसार शिवाजी जयंती तिथिनुसार मनाई जाती है |

छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु(How Chhatrapati Shivaji Maharaj Died in Hindi) –

छत्रपति शिवाजी महाराज के मृत्यु के बारे में दो मतभेद है, शिवाजी महाराज बहुत दिनों से बुखार से पीड़ित थे | जिससे उनकी मृत्यु हो गयी |

दूसरा मृत्यु का कारण यह है की उनके मंत्रियों ने ही शिवाजी को मारने का षड्यंत्र रचा था, जहर देने से उनकी मृत्यु हो गयी क्योंकि मंत्रियों को शिवाजी की राज्यकारभार चलाने की नीति पसंद नहीं थी |

३ एप्रिल इ.स. १६८० में शिवाजी महाराज की मृत्यु हुई तब महाराज की आयु ५० वर्ष थी |

History-Info of Shivaji Maharaj in Hindi: शिवाजी महाराज मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे | इ.स. १६७४ में मराठा साम्राज्य की राजधानी रायगढ़ पर उनका राज्यभिषेक हुआ, उसके बाद उनका नाम छत्रपति शिवाजी  महाराज हुआ |

शिवाजी महाराज ने शिस्तबद्ध लष्कर और सुसंघटित प्रशासकीय यंत्रणा के बलपर मराठा साम्राज्य का विस्तार किया | उनका साम्राज्य पश्चिम महाराष्ट्र, कोकण, सह्यद्रि पर्वतरांगाओं से नागपुर तक और उत्तर महाराष्ट्र, खानदेश से दक्षिण भारत में तंजावर तक फैला हुआ था | उन्होंने बलाढ्य मुघल शासकों से और विजापुर के आदिलशहा से, अंग्रेजों से संघर्ष करके अपने साम्राज्य का विस्तार किया है |

 

तो यह थी छत्रपति शिवाजी महाराज के सुवर्ण इतिहास पर आधारित जानकारी | हम उम्मीद करते है आपको हमारा (History-Info of Shivaji Maharaj in Hindi) यह लेख पसंद आया होगा | इसी के साथ आप हमारे अन्य मशहूर लेख

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1 Comment

Surbhi · June 9, 2022 at 6:38 am

शौर्य व धैर्याची मूर्ती, भारताचे शूर पुत्र छत्रपती शिवाजी महाराज
Nice

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