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जब भी भारत देश को आज़ादी दिलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अविस्मरणीय शहीदों के नाम लिए जाते है तब शहीदों के बादशाह शहीद-ए-आज़म भगतसिंह का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है | इसलिए आज Feelbywords.com आपके लिए लेकर आए है | शहीद-ए-आज़म भगतसिंह का सम्पूर्ण जीवन परिचय |

Biography on Shahid Bhagat Singh in Hindi

जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा, वह भारत देश है मेरा | हमारे भारत देश को यूं ही नहीं सोने की चिड़ियाँ की उपमा दी गई है | हमारे भारत भूमि को देवभूमि, संतभूमि, वीरों की भूमि कहा गया है | जैसे भगवान के कई जन्म, अवतार, संतों का जन्म इसी भारत भूमि पर हुआ है वैसे पराक्रमी वीरों का जन्म भी इसी भारत  भूमि पर हुआ है | इसलिए यह भारत भूमि हम भारतीयों के लिए पवित्र मानी जाती है और इस प्यारे वतन से भारत में जन्मे हर व्यक्ति को हर नागरिक को बहुत प्रेम है | हमारा जन्म भी इसी पवित्र भूमि पर हुआ है यह हमारे लिए गर्व की बात है |

हमारे इस प्यारे वतन पर प्राचीन काल में बहुत सारे विदेशी लोगों ने आक्रमण किया था जैसे मुघल,  तुर्क, पोर्तुगीज इ. और मध्यकाल में विदेशी अंग्रेज भारत में व्यापार के बहाने आए और भारत पर उन्होंने कब्जा कर लिया और यही बस गए | इन लोगों के कब्जे से अपना देश वापिस हासिल करने के लिए हमारे भारत मां के सुपूतों को बहुत संघर्ष करना पड़ा | इसके लिए इस भूमि पर जन्मे कई पराक्रमी वीरों को संघर्ष करना पड़ा और लड़ना पड़ा | कई पराक्रमी भारत मां के वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान किया और अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गए |

यह बात तब की है, जब आज से २०० साल पहले ब्रिटिश अंग्रेज भारत व्यापार के लिए आए और भारत पर उन्होंने कब्जा कर लिया था | इनसे हमारी मातृभूमि को बचाने के लिए हमारे भारत मां के वीरों को अपना खून बहाना पड़ा और अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ा | अंग्रेजों से हमारी मातृभूमि को आजाद करने के लिए भारत मां के जिन पराक्रमी वीरों ने अपने प्राणों की क़ुरबानी दी और अपने देश के लिए शहीद हो गए |  उन सब में सबसे पहला नाम शहीद-ए-आजम भगतसिंह का आता है |

Biography on Shahid Bhagat Singh in Hindi

हमारे  भारत देश को आजादी दिलाने में सबसे पहला योगदान जिनका रहा है उनका नाम है भगतसिंह, जी हाँ भगतसिंह | यह वही भगतसिंह है जिनकी बात हम इस आज के आर्टीकल में कर रहें है | शहीद भगतसिंह को इस भारत देश का हर व्यक्ति छोटों से लेकर बड़े से बड़ों तक हर कोई जानता है कि जिनके कारण आज हम इस देश में आजादी की खुली साँस ले पा रहे है वरना आज हम नरक से भी बदतर जिंदगी जी रहे होते |

शायद कुछ ही लोग होंगे जो इस शहीद भगतसिंहजी को नहीं जानते होंगे | इन्हीं लोगों के लिए आज हम इस आर्टीकल में शहीद-ए-आजम भगतसिंहजी के जीवन के बारे में और उनके बलिदान के बारे में जानकारी देने जा रहे है |

कैसा था शहीद-ए-आज़म भगतसिंह जी का बचपन?

भगतसिंहजी का जन्म २८ सितंबर १९०७ को एक सिख परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम

सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था | यह एक किसान परिवार से थे | भगतसिंहजी का जन्म पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है | उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलौं है जो पंजाब, भारत में है |  यह परिवार आर्य समाजी था | महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों का प्रभाव इन पर था | भगतसिंहजी को देशभक्ति के संस्कार उनके  परिवार से ही मिले थे |

इनके जन्म के समय इनके पिता ‘सरदार किशनसिंह’ और उनके दो चाचा ‘अजीतसिंह’ तथा ‘स्वर्णसिंह’ अंग्रेजों के खिलाफ होने के कारण जेल में बंद थे | उनके पिता और ओर दोनों चाचा १९०६ में लागू किए गए औपनिवेशीकरण कायदे के खिलाफ किए गए प्रदर्शन के कारण जेल में थे | उनके चाचा सरदार अजितसिंह आंदोलन के नेता थे और उन्होंने भारतीय देशभक्त संघ की स्थापना की  |

अजीतसिंहजी के खिलाफ २२ मामले दर्ज थे और उन्हें ईरान पलायन के लिए मजबूर किया गया था | इसके अलावा उनका परिवार गदर दल का समर्थक था | घर के देशभक्ति के माहौल ने भगतसिंहजी के दिल में देशभक्ति की भावना पैदा करने में मदद की |

जिस दिन भगतसिंहजी पैदा हुए उस दिन उनके पिता और चाचा को जेल से रिहा किया गया | इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंहजी के घर में ख़ुशी दोगुना और बढ़ गयी | इस ख़ुशी से अचानक इनकी दादी के मुंह से यह शब्द निकले की “यह मुंडा तो बहुत भागो वाला है” | जिसका मतलब होता है ‘अच्छे भाग्य वाला’  | बाद में उन्हें भगतसिंह कहा जाने लगा | कहते है की ‘बच्चे के पांव पालने में ही दिखाई पड़ जाते है’ |

भगतसिंहजी जब पांच साल के थे तब वह अनोखे खेल खेला करते थे | वह अपने साथियों के दो गुट बनाकर परस्पर एक-दूसरे पर आक्रमण करके युद्ध का अभ्यास किया करते थे | भगतसिंहजी के हर कार्य में उनके  वीर और निडर होने का आभास होता है |  बचपन में एक बार उनके चाचा अजितसिंह ने कहा था कि,  “समाज में मेरा भतीजा मेरे नाम से पहचाना जाएगा” तो इसपर भगतसिंहजी ने कहा था कि चाचा मैं जीवन में कुछ ऐसा करूंगा की आप मेरे नाम से जाने जाओगे|

भगतसिंह के जन्म की तारीख पर मतभेद है | कई किताबों में इनके जन्म की तारीख २८ सितंबर और कहीं-कहीं इनका जन्म दिन अक्तूबर भी दिया गया है | वैसे पुरानी किताबों और पत्र-पत्रिकाओं में भगतसिंहजी  का जन्म दिवस आश्विन शुक्ल तेरस, संवत १९६४ को शनिवार के दिन सुबह ६ बजे बताया गया है | इस तिथि को कुछ विद्वानों ने २७ सितंबर १९०७ तो कुछ ने २८ सितंबर बताया है |

कैसा था शहीद-ए-आज़म भगतसिंघ जी का शैक्षणिक जीवन?

भगतसिंहजी पढ़ने के शौकीन थे और वह यूरोपीय राष्ट्र वादी आंदोलन के बारे में पढ़ते रहे | वह फ्रेडरिक एंगेल्स और कार्ल मार्क्स के विचारों से बहुत प्रभावित थे, उन्हें पढ़कर उनके राजनीतिक विचारों का विकास हुआ | उनके दिमाग में समाज वादी विचारों को प्रोत्साहित किया गया | भगतसिंहजी जब चार-पांच वर्ष के हुए तो उन्हें गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिला दिलाया गया | भगतसिंह अपने दोस्तों के बीच बहुत लोकप्रिय थे | उन्हें स्कूल की चारदीवारी में बैठना अच्छा नहीं लगता था बल्कि उनका मन हमेशा खुले मैदानों में ही लगता था |

भगतसिंहजी ने पाँचवीं कक्षा तक की पढ़ाई अपने गांव के स्कूल में ही की | प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद भगतसिंहजी को १९१६-१७ में लाहौर के डी.ए.वी. [ दयानन्द एंग्लो हाईस्कूल ] स्कूल में दाखिला दिलाया गया | वहां उनका संपर्क लाला लाजपतराय और अम्बाप्रसाद जैसे देशभक्तों से हुआ |

Photograph Bhagat Singh with staff and students of the National College, Lahore for Non-Cooperation Movement.

Photograph Bhagat Singh with staff and students of the National College, Lahore for Non-Cooperation Movement.

१९१९ में “रॉलेट एक्ट” के विरोध में सम्पूर्ण भारत भर प्रदर्शन हो रहे थे और इसी वर्ष जलियांवाला बाग  हत्याकांड हुआ | जब वह बी.ए. की परीक्षा में थे तब उनके माता-पिता ने उनकी शादी करने की योजना बनाई | भगतसिंहजी ने शादी के लिए मना कर दिया और कहा कि, “यदि उनकी शादी गुलाम भारत में होगी तो मेरी दुल्हन की मृत्यु हो जाएगी”| वह शादी के बंधन में न पड़कर कानपुर भाग गए | फिर बाद में माता-पिता से शादी के लिए मजबूर नहीं करने के आश्वासन मिलने पर वह अपने माता-पिता के घर लाहौर लौट आए |

जालियांवाला हत्याकांड का शहीद-ए-आज़म भगतसिंघजी पर क्या प्रभाव पड़ा?

जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगतसिंहजी की सोच पर इतना गहरा प्रभाव डाला की लाहौर के नेशनल कालेज की पढ़ाई छोड़कर भगतसिंहजी ने भारत की आजादी के लिए नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की | वह १४ वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रांतिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे | डी.ए.वी स्कूल से उन्होंने नौवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की |

पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला नाम की एक जगह है | इस जगह पर १३ अप्रैल १९१९ को अंग्रेजों ने कई भारतीयों पर गोलियां बरसाई थी | उस कांड में कई परिवार खत्म हो गए | बच्चे, महिला और बूढ़े तक को अंग्रेजों ने नहीं छोड़ा था | उन्हें बंद करके गोलियों से छलनी कर दिया था |

इसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था | जब यह जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था उस समय भगतसिंहजी करीब बारह वर्ष के थे | इस घटना की सूचना मिलते ही भगतसिंहजी अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंच गए |

कैसे अपनी पढ़ाई छोड़कर शामिल हुए शहीद-ए-आज़म भगतसिंह असहयोग आंदोलन में?

भगतसिंहजी महात्मा गांधीजी से बहुत प्रभावित थे | इनके घर के सभी सदस्यों पर इनके विचारों का प्रभाव था | १९२१ में जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तब भगतसिंहजी अपनी पढ़ाई छोड़कर इस आंदोलन में शामिल हो गए | ५ अप्रैल १९२२ में चौरी-चौरा  हत्या कांड की घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया | इससे भगतसिंहजी को गहरा धक्का लगा और वह बहुत निराश हुए | गांधीजी के अहिंसात्मक आंदोलन की जगह उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए हिंसात्मक क्रांति का मार्ग अपनाना उचित समझा |

गांधीजी के असहयोग आंदोलन को रद्द करने से उनके मन में थोड़ा रोष उत्पन्न हुआ पर पूरे देश की तरह वह भी महात्मा गांधीजी का सम्मान करते थे | उन्होंने जुलूसों में भाग लेना शुरू किया और कई क्रांतिकारी दलों के सदस्य बने  | उनके दल के प्रमुख क्रांतिकारियों में चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इ. थे |

काकोरी कांड –
काकोरी कांड ने भगतसिंहजी को बुरी तरह से हिला दिया | इस कांड में ४ क्रांतिकारियों को फांसी और १६ अन्य को कारावास की सजा से भगतसिंहजी बहुत अधिक विचलित हुए | उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा’  का चंद्रशेखर आजाद की पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन’  में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया  हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन’ |   काकोरी कांड यह घटना एक ट्रेन लूट से जुडी है जो ९ अगस्त १९२५ को काकोरी से चली थी | आंदोलनकारियों ने इस ट्रेन को लूटने की योजना बनाई | जब ट्रेन लखनऊ से करीब ८ मील की दूरी पर थी तब उसमें बैठे तीन क्रांतिकारियों ने गाड़ी को रुकवाया और सरकारी खजाने को लूट लिया |

इस घटना ने अंग्रेजों को बड़ा परेशान किया |

काकोरी कांड को अंजाम देनेवाले अधिकतर लोग हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन’ से जुड़े थे | जिनमें से कुछ को बाद में इस मामले के लिए फांसी भी हो गई | इस लूट में करीब चार हजार रुपये लुटे गए थे |  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों ने यह खजाना इसलिए लुटा था की उन्हें ब्रिटिश राज के विरूद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने के लिए हथियार खरीदने की जरूरत थी |

ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना थी जो ९ अगस्त १९२५ को घटी | इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउजर पिस्तौल काम में लाए गए थे | इन पिस्तौलों कि विशेषता यह थी की इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था | हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था |

आइए जानते है की, लाला लाजपतराय जी की मृत्यु कैसे हुई थी?

१९२८ में साइमन कमिशन के बहिष्कार के लिए भयानक प्रदर्शन हुए | ३ फरवरी १९२८ को साइमन कमिशन भारत आया | भारतीय आंदोलनकारियों ने साइमन कमिशन वापस जाओ के नारे लगाए और जमकर विरोध किया | जेम्स स्कॉट नाम के ब्रिटिश पुलिस अधिकारी ने लाठीचार्ज करने का आदेश दिया था | ३० अक्टूबर १९२८ की  घटना है, लाला लाजपतराय लाहौर में साइमन कमिशन के आने का विरोध करने के लिए एक शांतिपूर्ण जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे |

इस प्रदर्शन में जिन लोगों ने भाग लिया था उन पर अंग्रेजों ने लाठीचार्ज किया | लाला लाजपतराय की छाती पर लाठियों से कई वार किए गए | इसमें वह बुरी तरह से घायल हो गए | उसके १८ दिन बाद इलाज के दौरान १७ नवंबर १९२८ को उनकी मृत्यु हो गई | इस बात का बदला लेने के लिए भगतसिंहजी ने एक गुप्त योजना बनाई | यह योजना पुलिस सुपरिंटेंडेंट जेम्स स्कॉट को मारने की थी जिसने लाठीचार्ज करने का आदेश दिया था पर गलती से इन्होंने राजगुरु के साथ मिलकर जे.पी. सांडर्स को मारा |

जे.पी. सांडर्स लाहौर के पुलिस हेडकॉटर से निकल रहा था तब सबसे पहले राजगुरुजी ने गोली चलाई और उसके बाद भगतसिंगजी ने गोली चलाई जो सांडर्स के माथे पर लगी थी | इस कारवाई में चंद्रशेखर आजाद ने भी उनकी पूरी मदद की थी | इस योजना का संचालन  करके उनको पीछे से गाइड करने का काम चंद्रशेखर आजाद कर रहे थे |सांडर्स की हत्या होने के बाद सिपाही चानन सिंह भगतसिंह और राजगुरु को पकड़ने के लिए इनके पीछे दौड़ा तो चंद्रशेखर आजादजी ने चानन सिंह को गोली मार दी | भगतसिंह और राजगुरु वहां से भाग गए सांडर्स की हत्या से ब्रिटिश अधिकारी डर गए | अंग्रेजी सरकार बौखला गई थी | पुलिस इन भागे हुए क्रांतिकारियों को चप्पे-चप्पे खोज रही थी

सॉडर्स की हत्या करने के बाद भगतसिंह, राजगुरु और अन्य साथी पुलिस की नजरों में धूल झोंक कर लाहौर से निकलने में कामयाब हो गए| कहा जाता है की इनके साथ सुखदेवजी भी थे | भगतसिंहजी  भेस बदलकर एक सरकारी अधिकारी के रूप में ट्रेन के प्रथम श्रेणी डिब्बे में श्रीमती दुर्गा देवी बोहरा जो भगतसिंहजी के क्रांतिकारी साथी शहीद भगवतीचरण बोहरा की पत्नी थी और उनके तीन वर्षीय पुत्र के साथ बैठ गए और राजगुरु उनके अरदली बन गए | इस तरह से  भगतसिंहजी लाहौर से कलकत्ता पहुंचने में सफल हो गए |

Pamphlet By HSRA After Saunders Murder

Pamphlet By HSRA After Saunders Murder

इसके अलावा चंद्रशेखर आजाद भी साधूँ के भेस में एक यात्री  दल के साथ मथुरा की ओर निकल गए थे | ब्रिटिश अधिकारी इस तरह हाथ मलते रह गए | इस तरह से भगतसिंहजी और उनके क्रांतिकारी साथियों ने लाला लाजपतराय की मौत का बदला ले लिया | भारत के महान बुजुर्ग लाला लाजपतराय पर किए गए अत्यंत घणित हमले से उनकी मृत्यु हुई | यह देश की राष्ट्रीयता का सबसे बड़ा अपमान था |

ब्रिटिश सरकार सॉडर्स के हत्या के केस में निर्दोष लोगों को पकड़ने लगी थी | लाहौर के पुलिस थाने में इस घटना की FIR तो हुई थी पर इसमें किसी का नाम नहीं था इसलिए पुलिस निर्दोष  लोगों को पकड़ रही थी |  इस बात का पता जब भगतसिंहजी को लगा तब उन्होंने सोचा की उनकी वजह से किसी निर्दोष को सजा न हो जाए | इसलिए उन्होंने एक नई योजना बनाई | उस वक्त भारत में  पब्लिक सेफ्टी बिल’  का विरोध हो रहा था | जिसमें मजदूरों द्वारा की जाने वाली हर तरह की हड़ताल पर पाबंदी   लगा दी गई थी | यह बिल तो पास हो चुका था परन्तु अभी तक इस बिल पर अध्यक्ष विठ्ठलभाई पटेल ने अपना फैसला नहीं सुनाया था |

दिल्ली के केंद्रीय असेम्ब्ली सभागार में ८ अप्रैल को सदन की कार्यवाही शुरू होने से कुछ मिनट पहले ११ बजे भगतसिंहजी और बटुकेश्वर दत्त बिना किसी का ध्यान आकर्षित किए हुए सभागार में दाखिल हो चुके थे | उस समय उन्होंने खाकी रंग की कमीज और हाँफ पैंट पहन रखी थी | उसके ऊपर उन्होंने स्लेटी रंग का चार खाने का कोट पहन रखा था जिसमें तीन बाहरी जेबें थी और एक जेब कोट के अंदर थी | उन दोनों ने ऊनी मोज़े भी पहन रखे थे |  भगतसिंहजी ने एक विदेशी फेल्ट हैट पहनी हुई थी | इस फेल्ट हैट को लाहौर की एक दुकान से खरीदा गया था |

photograph of Bhagat Singh, Rajguru & Sukhdev caught at Kashmiri gate.

photograph of Bhagat Singh, Rajguru & Sukhdev caught by Ramnath Photographer

दिलचस्प बात यह थी की ३ अप्रैल १९२९ को भगतसिंहजी और बटुकेश्वर दत्त ने उन्हीं कपड़ों में कश्मीरी गेट के रामनाथ फोटोग्राफर के दुकान पर अपनी तस्वीरें खिचाई थी, जिन कपडों में वह बम फेंकने एसेंब्ली हॉल जाने वाले थे | वह ६ अप्रैल को उन तस्वीरों को लेने दोबारा उस दुकान पर भी गए थे | ८ अप्रैल को एसेंब्ली में बम फेंकते समय भगतसिंहजी ने इस बात का ध्यान रखा की किसी को कोई नुकसान न हो |

जैसे ही बम फटा जोर की आवाज हुई और पूरा एसेंब्ली हॉल अंधकार में डूब गया पूरा हॉल धुआं -धुआं हो गया | वहां अफरातफरी मच गई तभी बटुकेश्वर ने दूसरा बम फेंका, लोगों ने बाहर के दरवाजे की तरफ भागना शुरू कर दिया | यह बम कम क्षमता के थे और इस तरह फेंके गए थे की किसी की जान न जाए | बम फेंकने के तुरंत बाद भगतसिंहजी और बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब जिंदाबाद’  के नारे लगाए और पर्चे पेड़ के पत्तों की तरह नीचे गिराने लगे |

भगतसिंहजी ने बम फेंकने के बाद अपनी आटोमैटिक पिस्तौल से हवा में एक बार फायरिंग की थी | यह गोली चलाने की बात इस योजना में शामिल नहीं थी, चंद्रशेखर आजाद ने इस बात के लिए मना किया था | फिर भी भगतसिंहजी ने जानबूझकर यह गलती की | दोनों ने स्वयं को अपनी स्वेच्छा से सरेंडर कर दिया | उनको अच्छी तरह पता था यह पिस्तौल सॉडर्स की हत्या में उनके शामिल होने का सबसे बड़ा सबूत है | इसलिए उन्होंने स्वयं को गिरफ्तार करवाने के लिए जानबूझकर एसेंब्ली में इसी पिस्तौल से हवा में फायरिंग की थी | पुलिस इन दोनों को अलग-अलग पुलिस थाने में ले गए ताकि इन दोनों को पूछताछ कर सके |

इस बम विस्फोट में भगतसिंहजी के खिलाफ ११ लोगों ने गवाही दी थी | उन्होंने भगतसिंहजी को और बटुकेश्वर दत्त को बम फेंकते हुए देखा था | इस केस में दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई | ८ अप्रैल १९२९ की तारीख भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है | अंग्रेजों को जगाने के लिए उन्होंने यह बम कांड किया था | ब्रिटिश हुकूमत को जगाने वाले आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों की हुकूमत को हिलाकर रख दिया और हजारों भारतीय युवाओं में आजादी की  उमंग जगा दी |

बम फेंकने के बाद दोनों ने वहां से फरार होने की बिलकुल कोशिश नहीं की | वहां लगातार इंकलाब जिंदाबाद’  के नारे लगते रहे और अपनी गिरफ्तारी दी | भगतसिंहजी और अन्य क्रांतिकारी जानते थे बिल पास ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता | वह यह भी जानते थे की उनके बम इन कानूनों को बनने से नहीं रोक पाएंगे | इसकी वजह थी कि नेशनल एसेंब्ली में ब्रिटिश सरकार के समर्थकों की कमी नहीं थी | इसके अलावा वॉयसरॉय को कानून बनाने के असाधारण अधिकार मिले हुए थे |

दरअसल बम फेंकने से लेकर गिरफ्तारी तक सबकुछ पूर्वनियोजित था और पूरा घटनाक्रम योजना के मुताबिक ही पूरा हुआ |

ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या के एक साल बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट्रल एसेंब्ली हॉल में बम फेंका था | इस केस में तो उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई पर सांडर्स की हत्या का मुकदमा चलना अभी बाकी था | वैसे तो भगतसिंहजी की पिस्तौल ही इस केस में सबसे बड़ा सबूत थी | अपने मुकदमे की सुनवाई के समय उन्होंने अपना कोई बचाव पेश नहीं किया,  बल्कि इसका इस्तेमाल उन्होंने भारत की आजादी की योजना का प्रचार करने में किया |

सांडर्स के केस में उनको फांसी की सजा ७ अक्तूबर १९३० को सुनाई गई, जिसे उन्होंने निर्भय होकर सुना | जेल में रहते उन्होंने विदेशी मूल के कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार करने की मांग की | उनके साथ इलाज में भेदभाव के विरोध में उन्होंने ११६ दिन की भूख हड़ताल की थी | उनकी फांसी की सजा सुनाने वाले न्यायाधीश का नाम जी.सी. हिल्ट्न था | ऐसा कहा जाता है की कोई भी मजिस्ट्रेट उनकी फांसी के समय उपस्थित रहने को तैयार नहीं था |

उनकी मौत के असली वारंट की अवधि समाप्त होने के बाद एक जज ने वारंट पर हस्ताक्षर किए और फांसी के समय तक उपस्थित रहे | भारतीय जज ‘जस्टिस आगा हैदर जैदी’ ने इस अन्याय को देखते हुए इस्तीफा दे दिया था पर इन क्रांतिकारियों के लिए फांसी नहीं लिखी | इससे साफ होता है की ब्रिटिश सरकार उन्हें जबरदस्ती फांसी देना चाहती थी |

भगतसिंहजी का केस बिजनौर  के आसफ अली ने लड़ा था | आसफ अली भगतसिंहजी के न्यायिक परामर्शदाता रहे थे | भगतसिंहजी के साथ एसेंब्ली में बम फेंकने वाले बटुकेश्वर दत्त का भी पक्ष उस  समय न्यायालय में प्रसिद्ध वकील आसफ अली ने ही रखा था | बम कांड के मुकदमे के दौरान सरदार भगतसिंहजी ने अपनी पैरवी खुद करने की मांग की थी,  जिसे मंजूर कर लिया गया था पर भगतसिंहजी वकील आसफ अली से न्यायिक परामर्श लेते रहे | इन दोनों का मुकदमा लड़कर बिजनौर के ऐतिहासिक पुरुष बन गए थे | आसफ अली देश की आजादी के बाद अमेरिका में भारत के पहले राजदूत नियुक्त किए गए थे | उनकी मृत्यु २ अप्रैल १९५३ को स्विट्जरलैंड में हुई |

आखिर क्यों भगतसिंहजी को एक दिन पहले ही दे दी गयी फांसी?

सांडर्स की हत्या के केस में  भगतसिंहजी को फांसी हुई थी उसकी तारीख २४ मार्च १९३१ तय की गई थी | लेकिन उस समय पूरे भारत में इस फांसी को लेकर जिस तरह से विरोध और प्रदर्शन जारी था उससे सरकार डरी हुई थी | इसलिए ब्रिटिश सरकार ने भगतसिंहजी, सुखदेवजी और राजगुरुजी को चुपचाप तरीके से तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी |

भगतसिंहजी के आखिरी शब्द –

लाहौर सेंट्रल जेल में २३ मार्च, १९३१ की शुरु वात किसी और दिन की तरह ही हुई थी | फर्क सिर्फ इतना सा था की सुबह-सुबह जोर की आँधी आई थी | सुबह चार बजे ही वॉर्डन ने जेल के कैदियों को कहा की वह लोग अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाए, वॉर्डन ने कारण नहीं बताया | उसके मुंह से सिर्फ यह निकला की आदेश ऊपर से है | अभी कैदी सोच ही रहे थे की माजरा क्या है तभी जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुजरा की आज भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है |

उस क्षण ने उनको झकझोर कर रख दिया | कैदियों ने बरकत से कहा की वह फांसी के बाद भगतसिंह की कोई भी चीज जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वह लोग अपने  पोते-पोतियों को बता सके की कभी वह भी भगतसिंह के साथ जेल में बंद थे | बरकत भगतसिंहजी के कोठरी में गया और वहॉँ से उनका पेन और कंघा ले आया | सारे कैदियों में  होड़ लग गई की किसका उस पर अधिकार हो | आखिर में ड्रा निकला गया |

भगतसिंहजी फांसी के दो घंटे पहले ‘लेनिन की जीवनी नाम की किताब पढ़ रहे थे | उनके वकील ने कहा की क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे?  भगतसिंहजी ने किताब से अपना मुंह हटाए बगैर कहा,  “सिर्फ दो संदेश…. साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंकलाब जिंदाबाद”|

इसके बाद भगतसिंहजी ने वकील प्राणनाथ मेहता से कहा वह पंडित नेहरू और सुभाषचंद्र बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी | भगतसिंहजी से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे | मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल के अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया की उनको वक्त से ११ घंटे पहले ली फांसी दी जा रही है | अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम साढ़े सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा | भगतसिंजी मेहता द्वारा दी गई किताब ‘लेनिन की जीवनी के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे, की उनके मुंह से निकला, “क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी खत्म नहीं करने देंगे?”

एक दिन पहले फांसी देने का मकसद था की तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दिए जाने के तय दिन कोई हंगामा न हो जाए | अंग्रेजी हुकूमत देश भर में उठ रहे विरोध के स्वर और प्रदर्शन से डरी हुई थी |  देश भर में फांसी के लिए लोगों का विरोध हो रहा था तो दूसरी ओर जेल में इन तीनों को किसी तरह की चिंता नहीं थी, तीनों यही चाहते थे | फांसी से यह तीनों खुश थे | इन्होंने अपने बचाव के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया था | सब बाते इनकी पूर्व नियोजित योजना से चल रही थी |

भगतसिंहजी जानते थे की जो उन्होंने आजादी की नींव डाली थी, जो आजादी की चिंगारी भारतीय लोगों के मन में जलाई थी उसे ज्वाला का रूप भगतसिंहजी के प्राणों का बलिदान ही दें सकता था | उनके शहीद होने से ही जनता में आक्रोश  बढ़ेगा और भारतीय जनता अपनी मातृभूमि को आजाद करने के लिए संघर्ष करेगी, लड़ेगी |

ब्रिटिश सरकार को आशंका थी की फांसी की मुकर्रर की तारीख २४ मार्च १९३१ को सजा देने के समय किसी तरह का विद्रोह पैदा न हो जाए इसलिए २३ मार्च को ११ घंटे पहले ही फांसी दी गई थी | फांसी के समय वहां कुछ अधिकारी लोग मौजूद थे, भगतसिंहजी ने डेप्युटी मिनिस्टर की तरफ एक  नजर देखा और कहा की, “मजिस्ट्रेट आप किस्मत वाले हो, आपको यह सब देखने को मिल रहा है“| फांसी के वक्त यह उनके आखिरी शब्द थे |

जेल में इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूँज रहे थे |उन तीनों को शाम ७ बजकर ३३ मिनट पर फांसी दी गई |  जब तीनों को फांसी के लिए ले जा रहे थे तब तीनों अपनी मस्ती में यह गीत गा रहे थे …..

मेरा रँग दे बसंती चोला, मेरा रँग दे |

मेरा रँग दे बसंती चोला | माय रँग दे बसंती चोला ||

फांसी के बाद कहीं कोई आंदोलन न भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए फिर इसे बोरियों में भरकर जेल की पिछली दीवार तोड़कर पिछले रास्ते से फिरोजपुर की ओर सतलज नदी के किनारे ले गए जहां घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा | आसपास के गांव के लोगों ने जलती आग और धुवाँ देखा तो वह करीब आए | इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजलें टुकड़ों को सतलज नदी में फेंका और भाग गए |

जब गांव वाले पास आए तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ों को एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया और भगतसिंहजी हमेशा के लिए अमर हो गए | इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गांधीजी  को भी इनकी मौत का जिम्मेदार समझने लगे | इस घटना के दो दिन बाद ही गांधीजी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झंडे दिखाकर काले कपड़े के फूलों से लोगों ने गांधीजी का स्वागत किया | एकाध जगह पर गांधीजी पर हमला भी हुआ किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने उन्हें बचा लिया | लोगों से बचने के लिए गांधीजी ट्रेन में भगतसिंहजी के पिता किशनसिंहजी को अपने साथ बिठाकर ले गए |

भगतसिंहजी ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वह भारतीय युवकों के लिए बहुत बड़ा आदर्श बना रहेगा | भगतसिंहजी को हिंदी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी | जेल के दिनों में उनके लिखे खतों और लेखों से उनके विचारों का अंदाजा लगता है | भगतसिंहजी लेखक, पाठक और संपादक भी थे | उन्होंने अपने लेख में भारतीय समाज में भाषा, जाति और धर्म के कारण आई दूरियों पर दू:ख व्यक्त किया था | उनका विश्वास था की उनके शहीद होने से भारतीय जनता और उग्र हो जाएगी, लेकिन जब तक वह जिन्दा रहेंगे ऐसा नहीं हो पाएगा | इसी कारण उन्होंने फांसी की सजा सुनाने के बाद भी माफीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था |

यह संयोग ही था जब उनको फांसी दी गई तब २३ तारीख थी और उनकी उम्र भी २३ वर्ष ५माह और २३ दिन थी | अपने फांसी से पहले भगतसिंहजी ने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें कहा था की उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध भारतीयों के युद्ध का प्रतीक समझकर एक युद्ध बंदी समझा जाए और फांसी देने के बजाए गोली से उड़ा दिया जाए | लेकिन ऐसा नहीं हुआ |

भगतसिंहजी के शहीद होने से अपने देश की स्वतंत्रता के लिए होने वाले संघर्ष को गति मिली और भारतीय नवयुवकों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बन गए | वह देश के समस्त शहीदों के बादशाह बन गए | २३ मार्च १९३१ इस शहीद दिन को भारत और पाकिस्तान दोनों देश भगतसिंहजी को याद करते है और उनको श्रद्धांजलि दी जाती है | आज भी सारा देश उनके बलिदान को बड़ी गंभीरता और सम्मान से याद करता है | सरदार भगतसिंहजी का नाम अमर शहीदों में सबसे पहले लिया जाता है |

भगतसिंहजी देश के आजादी के संघर्ष में ऐसे रमे की उन्होंने अपना पूरा जीवन ही देश को समर्पित कर दिया | भारत की आजादी के इतिहास में अमर शहीद भगतसिंहजी का नाम स्वर्ण अक्षरों में  लिखा गया है | भारत जब भी अपने आजाद होने पर गर्व महसूस करता है तो उसका सर उन महापुरुषों के लिए हमेशा झुकता है जिन्होंने देश प्रेम की राह में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया |

इन स्वतंत्रता सेनानियों की तरह हमारे देश के नेताओं ने भी यह काम किया होता तो हम और भी अधिक गर्व महसूस करते | देश के स्वतंत्रता संग्राम में हजारों ऐसे नौजवान भी थे जिन्होंने ताकत के बल पर आजादी दिलाने की ठानी और क्रांतिकारी कहलाए | भारत में जब भी क्रांतिकारियों का नाम लिया जाता है तो सबसे पहला नाम भगतसिंहजी का आता है | उस समय देश के बड़े नेताओं ने भी भगतसिंहजी और उनके क्रांतिकारी साथियों का सहयोग किया होता तो हमारा भारत देश वक्त से पहले आजाद हो जाता |

इन नेताओं ने भगतसिंहजी से और अन्य क्रांतिकारियों से सीख लेनी चाहिए | २३ उम्र की छोटी सी जिंदगी में भगतसिंहजी ने बड़े-बड़े महान कार्य किए और सबसे महान कहलाए |सांडर्स की हत्या करने के बाद जब वह भेस बदलकर भाग रहे थे तो सिख होने के बावजूद भी भगतसिंहजी को अपनी दाढ़ी और केश काटने पड़े थे | अंग्रेजों ने भगतसिंहजी को तो फांसी दे दी पर उनके विचारों को खत्म नहीं कर पाए जिसने देश कि आजादी की नींव रखी थी |

गांधीजी ने असहयोग आंदोलन पीछे ले लिया था तब से भगतसिंहजी को विश्वास हो गया था की गांधीजी की शांति और अहिंसा की नीति से  देश को आजादी नहीं मिल सकती,  इसके लिए सशस्त्र क्रांति करनी होगी | और यही हुआ की  भगतसिंहजी के सशस्त्र क्रांति से ही अंग्रेजी हुकूमत डर गई, बेचैन हुई, हिल गई | आज भी देश में भगतसिंह क्रांति की पहचान है |  इंकलाब जिंदाबाद …

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भगतसिंहजी ने जेल में लिखें कुछ अनमोल विचार (Quotes)

१]   इस कदर वाकिफ है मेरी कलम में जज्बातों से,

अगर मैं इश्क भी लिखना चाहूँ तो इंकलाब लिखा जाता है |

२]  सीने पर जो जख्म है, सब फूलों के गुच्छे है;

हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे है |

३]  जिंदगी तो सिर्फ अपने कंधों पर जी जाती है,

दूसरों के कंधों पर तो जनाजे उठते है |

४]  वे मुझे मार सकते है, लेकिन मेरे विचारों को नहीं;

वे मेरे शरीर को कुचल सकते है, लेकिन मेरी आत्मा को नहीं |

५]   मेरा केवल एक ही धर्म है और वह देश की सेवा करना है |

६]   मनुष्य का कर्तव्य है प्रयास करना और मेहनत करना,

सफलता अवसर और वातावरण पर निर्भर करती है |

७]   राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है,

मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आजाद है |

८]   सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,

देखना है जोर कितना बाजुएँ कातिल में है |

९]   तर्क किए बिना किसी भी बात को,

आंख मूंदकर मान लेना भी एक प्रकार की गुलामी है |

१०]   प्रेमी, पागल और कवि एक ही थाली के चट्टे-बट्टे होते है |

११]   “इस संसार में हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है उसकी स्वतंत्रता,

जिसे कोई नहीं खत्म कर सकता |

१२]    श्रम ही समाज का वास्तविक निर्वाहक है |

भगतसिंहजी भारत के एक महान क्रांतिकारी थे | उन्होंने अपने विचारों से भारत के लोगों को बहुत ज्यादा प्रभावित किया | उनके अनमोल वचन आज भी बहुत ज्यादा प्रचलित है | भगतसिंहजी ने देश के हर एक नौजवान को अपने अनमोल विचारों से प्रेरित किया और उन्हें आजादी के इस महान संग्राम में आने के लिए भी प्रोत्साहित किया |

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